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Sunday, April 19, 2015

ग्रीन टी पीजिए और बीमारी दूर भगाइए


ग्रीन टी के लाभ
दांतों की रक्षा में सहायक: ग्रीन टी प्लाक में मौजूद नुक्सानदायक बैक्टीरिया को नष्ट कर दांतों की रक्षा करती है। इसमें मौजूद फ्लोरीन दांतों में खोड़ों (कैविटीज) के बनने को रोकता है।

आर्थराइटिस पर नियंत्रण : जो लोग चार या पांच कप ग्रीन टी का सेवन करते हैं वे रूमेटाइड आर्थराइटिस पर नियंत्रण कर सकते हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में मदद: कुछ लोगों में स्टैमिना की कमी होती है, ग्रीन टी में मौजूद गुराना उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।
गुर्दे के संमणों से सुरक्षाऱ् ग्रीन टी के नियमित सेवन से गुर्दों के संमण की संभावना कम होती है।

दिमागी बीमारियों से लडने में सहायताऱ् ग्रीन टी में विभिन्न किस्म के पोषक तत्व पाए जाते हैं जो मल्टीपल स्कलीरोसिस जैसी दिमागी बीमारियों से लडने में सहायक होते हैं। ये दिमाग की कार्यप्रणाली को भी बढ़ाते हैं।
पाचन और भूख में : ग्रीन टी के सेवन से पाचन यिा बेहतर और तेज गति से काम करती है और यह भूख भी बढ़ाती है।

कैंसर से रक्षा में : माना जाता है कि ग्रीन टी में कुछ ऐसे पोषक तत्व होते हैं जो कैंसर कोशिकाओं को शरीर में प्रवेश करने से रोकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जो लोग कैंसर से जूझ रहे हैं वे ग्रीन टी के लगातार सेवन से इस बीमारी को रोकने में सक्षम हो सकते हैं। ग्रीन टी में एपीगैलोकैटेचिन गैलेट नामक एक एंटी-आक्सीडैंट होता है जो कैंसर पैदा करने वाली कोशिकाओं के विकास को रोकता है।

हृदय की रक्षा में : ग्रीन टी एल.डी.एल. कोलैस्ट्राल की आक्सीडेशन को रोकती है। इस प्रकार धमनियों में प्लाक में कम होने से हृदय रोगों का खतरा कम होता है। यह सब एपीगैलोकैटेचिन गैलेट के कारण होता है।
त्वचा की रक्षा में : गर्म पानी में मिलाए गए ग्रीन टी के सत्व त्वचा पर बाहरी तौर पर लगाने से रेडिएशन के प्रभाव कम होते हैं। रेडिएशन से प्रभावी रक्षा के लिए उसे प्रतिदिन तीन बार लगाना चाहिए।

शरीर से फैट हटाने में : ग्रीन टी की सहायता से हम शरीर में कैलोरीज के बर्न होने की प्रयिा को तेज कर सकते हैं। शरीर में पोलीफिनोल्स की जितनी अधिक मात्रा होगी उतने फैट बनग इफैक्ट्स होंगे। ग्रीन टी पोलीफिनोल्स का एक भरपूर स्रोत है इसीलिए इसे वजन कम करने वाले विकल्पों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह मोटापे की सबसे बढिया औषधि है। इसलिए इसे डेली डाइट में शामिल करके न सिर्फ फैट कम होती है बल्कि साथ ही यह आपके शरीर को साफ करके विभिन्न रोगों से आपकी रक्षा करती है।

टाइप 1 डाइबिटीज़ में ग्रीन टी के लाभ
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By: ओन्लीमाईहैल्थ लेखक, ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग

टाइप 1 डाइबिटीज़ के रोगियों के लिए ग्रीन टी बहुत फायदेमंद होती है क्‍योंकि ग्रीन टी में एंटीआक्सिडेंट्स भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं।
[इसे भी पढ़े- ग्रीन टी के फायदे]
ब्‍लड शुगर को नियंत्रित करना

ग्रीन टी शरीर में ग्‍लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करती है,और इन्‍सुलिन दवा के हानिकारक प्रभावो को कम करने में भी मदद करती है । यूनिवर्सिटी ऑफ मेरिलैंड मेडिकल सेंटर के अनुसार ग्रीन टी शरीर में ना सिर्फ टाइप 1 डाइबिटीज़ को कम करता है बल्कि इसके बुरे प्रभाव को भी कम करता है।

हाइपरटेंशन को कम करना

2004 में चीन में किए गए एक शोध के अनुसार एक दिन में एक कप ग्रीन टी पीने से 50 प्रतिशत तक हाई ब्‍लड प्रेशर में कमी आती हैं,ग्रीन टी खून की धमनियों को आराम पहुंचाता है,जिससे हाइ ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या में आराम मिलता हैं।
[इसे भी पढ़े- ग्रीन टी से दुरुस्‍त करें याददाश्‍त]
कालेस्‍ट्राल को कम करना
जो लोग रोज ग्रीन टी का सेवन करते है उनमें कालेस्‍ट्राल की मात्रा कम होती है उन लोगों के मुकाबले जो ग्रीन टी नहीं लेते इसलिए क्‍योंकि उनका मानना है कि उसमें मौजूद पॉलिफेनल से कालेस्‍ट्राल बढ़ता है।.

ग्रीन टी लेने के तरिके
रोज कम से कम आधा कप ग्रीन टी पीने से टाइप 1 डाइबिटीज़ की बीमारी से आराम मिलता हैं,एक साल तक नियमित इसका सेवन करने से ज्‍यादा से ज्‍यादा शारीरिक लाभ मिलेगा, ग्रीन टी ना पीने वालों को हाइपरटेंशन के खतरों ज्‍यादा की आशंका रहती है, रोज ग्रीन टी पीने से डाइबिटीज़ एवं हाइपरटेंशन में आराम मिलता है।
[इसे भी पढ़े- टाइप 1 मधुमेह को नियंत्रित करने के तरीके]
ग्रीन टी में होते हैं एक्‍टिव एजेन्‍ट
ग्रीन टी में मौजूद एक्‍टिव एजेन्‍ट जैसे केटेचीन,इजीसीजी,इन्‍सुलिन की मात्रा को बढ़ाने में मदद करती है,साथ ही यह एन्‍टी-ओक्‍सेट के रूप में भी कार्य करता है।

चेतावनी
ग्रीन टी में कैफेन की मात्रा कॉफी के मुकाबले ज्‍यादा होती है,ज्‍यादा ग्रीन टी पीने से यह इससे मिलने वाले लाभ को कम करता है,जैसे- हाइपरटेशन इत्‍यादि, कई बार डाइबिटीज़ के प्रभावों को बढ़ाता है। कोशिश करें कि टी की सही मात्रा लें ताकि आपको इसका लाभ मिल सके और आप ओवरियन कैंसर, हेपेटाइटिस एवं अन्‍य शारीरिक समस्‍याओं के खतरों से बच सके।

ग्रीन टी के फायदे
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By ओन्लीमाईहैल्थ लेखक, ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग

ग्रीन टी स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बहुत लाभदायक है। ग्रीन टी पीने से न केवल सामान्‍य बीमारियां दूर रहती हैं बल्कि कैंसर और अल्‍जाइमर के मरीजों के लिए यह फायदेमंद है।


मोटापा कम करने में ग्रीन टी बहुत मदद करती है। ग्रीन टी पीने से आप तरोताजा महसूस करेंगे। ग्रीन टी को कैमिला साइनेंसिस की पत्तियों को सुखाकर तैयार किया जाता है। आइए हम आपको बताते हैं‍ कि ग्रीन टी पीना हमारे स्‍वास्‍थ्‍य के लिए कितना फायदेमंद है।

ग्रीन टी के गुण

प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत
ग्रीन टी में विटामिन सी, पालीफिनोल्स के अलावा अन्य एंटीआक्सीडेंट मौजूद होते हैं जो कि शरीर के फ्री रेडीकल्स को नष्ट कर इम्‍यून सिस्‍टम को मजबूत बनाते हैं। दिन में तीन से चार कप ग्रीन टी शरीर में लगभग 300-400 मिग्रा पालीफिनोल पहुंचाती है, इससे शरीर में बीमारियां होने का खतरा कम होता है और शरीर रोग-मुक्‍त होता है।

कैंसर से रखे दूर
ग्रीन टी कैंसर के सेल को बढ़ने से रोकती है। ग्रीन टी मुंह के कैंसर के लिए बहुत ही फायदेमंद है। इसके नियमित प्रयोग से पाचन नली और मूत्राशय के कैंसर की आशंका न के बराबर रहती है। इसलिए कैंसर के मरीजों के लिए ग्रीन टी रामबाण है।

दिल के लिए
ग्रीन टी पीने से मेटाबॉलिज्‍म का स्‍तर बढ़ता है। जिसके कारण शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा संतुलित रहती है। कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा संतुलित रहने से रक्त चाप सामान्य रहता है। ग्रीन टी खून को पतला बनाए रखती है जिससे खून का थक्का नहीं बन पाता। ग्रीन टी पीने से हार्ट अटैक आशंका बहुत कम रहती है।

वजन घटाए
मोटापा कम करने में ग्रीन टी बहुत मदद करती है। खाने के बाद एक कप ग्रीन टी पीने से पाचन की गति बढ़ जाती है। ग्रीन टी में मौजूद कैफीन से कैलोरी खर्च करने की गति भी बढ़ जाती है। इसके कारण वजन कम होता है।

मुंह के लिए
ग्रीन टी मुंह के लिए बहुत फायदेमंद है। ग्रीन टी में ऑक्‍सीकरण रोधी पॉलीफिनॉल पाया जाता है जो मुंह में उन तत्‍वों को खत्‍म कर देता है जो सांस संबंधी परेशानियों के लिए जिम्‍मेदार होते हैं।

ग्रीन टी पर हर रोज नए-नए शोध हो रहे हैं। ग्रीन टी कई रोगों के इलाज में रामबाण साबित हुई है। ग्रीन टी अल्‍जाइमर, पार्किंसन, मल्‍टीपल स्‍कलेरोज, कैंसर, मोटापा और हृदय संबंधी रोगों के लिए फायदेमंद है।

Friday, April 3, 2015

इस्लाम मे औरत के अधिकार


इस्लाम और मुसलमानों के सम्बन्ध में जो ग़लतफहमियॉ पार्इ जाती हैं उनमें से कुछ गलतफहमियॉ औरतों के बारे में हैं। इस्लाम से पहले आमतौर से हर समाज और हर सोसाइटी में औरत को हीन समझा था। उसका अपमान किया जाता और तरह-तरह के अत्याचारों का उसे निशाना बनाया जाता था। • भारतीय समाज में पति के मर जाने पर पति की लाश के साथ पत्नी को भी जिन्दा जल जाना पड़ता था। • चीन में औरत के पैर में लोहे के तंग जूते पहनाए जाते थें। • अरब में लड़कियों को जीवित गाड़ दिया जाता था। इतिहास गवाह हैं कि इन अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाने वाले सुधारक निकटवर्ती युग में पैदा हुए हैं, लेकिन इन सभी सुधारकों से शताब्दियों पहले अरब देश में प्यारे नबी सल्ल0 औरतों के हितैषी के रूप में नजर आते हैं और औरतों पर ढाये जाने वाले अत्याचारों का खात्मा कर देते हैं। औरत के अधिकारों से अनभिज्ञ, अरब समाज मे प्यारे नबी सल्ल0 ने औरत को मर्द के बराबर दर्जा दिया। औरत का जायदाद और सम्पत्ति मे कोर्इ हक न था, आप स0 ने विरासत मे उसका हक नियत किया। औरत के हक और अधिकार बताने के लिए कुरआन मे निर्देश उतारे गये। मॉ-बाप और अन्य रिश्तेदारों की जायदाद में औरतों को भी वारिस घोषित किया गया। आज सभ्यता का राग अलापने वाले कर्इ देशों में औरत को न जायदाद का हक हैं न वोट देने का। इंग्लिस्तान में औरत को वोट का अधिकार 1928 र्इ0 पहली बार दिया गया। भारतीय समाज मे औरत को जायदाद का हक पिछले दिनों में हासिल हुआ। लेकिन हम देखते हैं कि आज से चौदह सौं वर्ष पूर्व ही ये सारे हक और अधिकार नबी स0 ने औरतों को प्रदान किये। कितने बड़े उपकार कर्ता हैं आप! आप स0 की शिक्षाओं में औरतों के हक पर काफी जोर दिया गया हैं। आप स0 ने ताकीद की लोग इस कर्तव्य से गाफिल न हो और न्यायसंगत रूप से औरत को मारा-पीटा न जाय। औरत के साथ कैसा बर्ताव किया जाय, इस सम्बन्ध मे नबी स0 की बातों का अवलोकन कीजिए: (1) अपनी पत्नी को मारने वाला अच्छे आचरण का नही हैं। (2) तुममें से सर्वश्रेष्ट व्यक्ति वह हैं जो अपनी पत्नी से अच्छी सूलूक करे। (3) औरतों के साथ अच्छे तरीके से पेश आपे का खुदा हुक्म देता हैं, क्योकि वे तुम्हारी मॉ, बहिन और बेटियॉ हैं। (4) मां के कदमों के नीचे जन्नत हैं। (5) कोर्इ मुसलमान अपनी पत्नी से नफरत न करें। अगर उसकी कोर्इ एक आदत बुरी हैं तो उसकी दूसरी अच्छी आदत को देख कर मर्द को खुश होना चाहिए। (6) अपनी पत्नी के साथ दासी जैसा व्यवहार न करो। उसको मारो भी मत। (7) जब तुम खाओं तो अपनी पत्नी को भी खिलाओं । जब तुम पहनो तो अपनी पत्नी को भी पहनाओं (8) पत्नी को ताने मत दों। चेहरे पर न मारो। उसका दिल न दुखाओं। उसकी छोड़कर न चले जाओं। (9) पत्नी अपने पति के स्थान पर समस्त अधिकारों की मालिक हैं। (10) अपनी पत्नियों के साथ जो अच्छी तरह बर्ताव करेंगे, वही तुम में सबसे बेहतर हैं। ठतने अधिकार प्रदान करके औरत को बिल्कुल आजाद भी नही छोड़ा, बल्कि उसे कुछ बातों का पाबन्द भी किया: 1-औरत इस तरह रहे कि जब उसका पति उसे देखे तो खुश हो जाय। जब कोर्इ हुक्म दे तो उसे पूरा करें। पति अगर दूर हो तो उसकी सम्पत्ति और अपने सतीत्व की सुरक्षा करें। ऐसी ही स्त्री आदर्श पत्नी समझी जायेगी। 2-सुशीला पत्नी का मिल जाना अमूल्य पूंजी के बराबर हैं। 3-जो पांचो समय की रोजाना नमाज पढ़े, रमजान के रोजे रखे और अपने पति का कहा माने तथा अपने सतीत्व की सुरक्षा करें, ऐसी औरत जिस रास्ते से चाहे जन्नत में प्रवेश करें। 4-दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा कीमती चीज पाक दामन बीबी हैं। इस तरह प्यारे नबी स0 ने औरतों को अधिकार भी दिये और उन्हे उनके कर्तव्यो से भी बाखबर किया। किसी को आपत्ति हो सकती हैं कि औरतों को इतने सारे अधिकार प्रदान करने वाले इस्लाम में बहुपत्नीवाद की अनुमति क्यों हैं? क्या यह औरतों पर खुला जुल्म नहीं हैं। इस सिलसिले में हमे इतिहास, पुरूष के स्वभाव और जिन्दगी के व्यावहारिक मसलों को सामने रखना होगा। हिन्दुस्तान के राजा दशरथ के कर्इ पतिनयां थी। इसी तरह कृष्णाजी को भी हम रूक्मिणी, सत्यबा और राधा के अलावा असंख्य गोपियों के बीच देखते हैं। बल्ली औरतों के साथ मरगन जैसे देवता को हम ऐश करते हुए पाते हैं। यह तो थी प्राचीन काल और पुराणों की बात, अब ऐतिहासिक घटनाओं को लीजिए। बड़े-बड़े राजाओं के यहॉ एक से अधिक पत्नियॉ होती थी। तमिलनाडू के कटटा बम्मन के घर कर्इ पत्नियां थी। आज भी कुछ राजनैतिक नेता कर्इ पत्नियां रखते हैं। इस्लाम से पहले अरब मे पत्नियों की संख्या पर कोर्इ हदबन्दी नही थी। प्यारे नबी ने मर्द के स्वभाव और अमली जरूरतों का ध्यान रख कर इस असीम संख्या को चार तक सीमित रखा। इस्लाम से पहले अरब दुनिया में शादी विवाह का कोर्इ विशेष नियम और सिद्धान्त न था। गिरोहो और कबीलों के बीच पत्नियॉ और दासियां रखने जब चाहा तलाक दे दी, इन हालात के सुधार के लिए खुदा के निर्देश आये, पत्नियों की संख्या को सीमित कर दिया गया और तलाक के सम्बन्ध में उचित नियमों और शिष्टाचार की पाबन्दी का हुक्म दियागया कुरआन में फरमाया गया। ‘‘ तुम्हे अगर आशंका हो कि यतीम बच्चो की परवरिश बगैर शादी किये न हो सकेगी तो अपनी पसन्द की दो, तीन या चार औरतों से तुम विवाह कर सकते हो (यह आशंका हो कि उनके साथ भी तुम न्याय न कर पाओगे तो) और औरत या दासी ही पर बस करो, अन्याय से बचने के लिए यह आसान तरीका हैं। (निसा 6) क्ुरआन की इस हिदायत मे जो हिकमते और भलार्इयां हैं उन पर भी विचार कीजिए। न्याय, इंसाफ तथा सच्चार्इ के साथ पत्नी से पेश आओ। बहुस्त्रीवाद की अनुमति भी हैं और इसी के साथ-साथ नाइंसाफी से बचने की ताकीद भी। न्याय और इन्साफ सम्भव न हो तो एक ही शादी पर जोर दिया गया हैं। मर्द को किसी भी समय अपनी काम तृष्णा की जरूरत पेश आ सकती हैं। इसलिए कि उसे कुदरत ने हर हाल मे हमेशा सहवास के योग्य बनाया हैं जबकि औरतों का मामला इससे भिन्न हैं। माहवारी के दिनो मे, गर्भावस्था में (नौ-दस माह) प्रसव के बाद के कुछ माह औरत इस योग्य नही होती कि उसके साथ उसका पति सम्भोग कर सके। सारे ही मर्दो से यह आशा रखना सही न होगा कि वे बहुत ही संयम और नियन्त्रण से काम लेंगे और जब तक उन की पत्नियां इस योग्य नही हो जाती कि वे उनके पास जायें, वे काम इच्छा को नियंत्रित रखेंगे। मर्द जायज तरीके से अपनी जरूरत पूरी कर सके, जरूरी है कि इसके लिए राहे खोली जायें और ऐसी तंगी न रखी जाय कि वह हराम रास्तों पर चलने पर विवश हों। पत्नी तो उसकी एक ही हो, आशना औरतों की कोर्इ कैद न रहे। इससे समाज मे जो गन्दगी फैलेगी और जिस तरह आचरण और चरित्र खराब होंगे इसका अनुमान लगाना आपके लिए कुछ मुश्किल नही हैं। व्यभिचार और बदकारी को हराम ठहराकर बहुस्त्रीवाद की कानूनी इजाजत देने वाला बुद्धिसंगत दीन इस्लाम हैं। इस्लाम और मुसलमानों के सम्बन्ध में जो ग़लतफहमियॉ पार्इ जाती हैं उनमें से कुछ गलतफहमियॉ औरतों के बारे में हैं। इस्लाम से पहले आमतौर से हर समाज और हर सोसाइटी में औरत को हीन समझा था। उसका अपमान किया जाता और तरह-तरह के अत्याचारों का उसे निशाना बनाया जाता था। • भारतीय समाज में पति के मर जाने पर पति की लाश के साथ पत्नी को भी जिन्दा जल जाना पड़ता था। • चीन में औरत के पैर में लोहे के तंग जूते पहनाए जाते थें। • अरब में लड़कियों को जीवित गाड़ दिया जाता था। इतिहास गवाह हैं कि इन अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाने वाले सुधारक निकटवर्ती युग में पैदा हुए हैं, लेकिन इन सभी सुधारकों से शताब्दियों पहले अरब देश में प्यारे नबी सल्ल0 औरतों के हितैषी के रूप में नजर आते हैं और औरतों पर ढाये जाने वाले अत्याचारों का खात्मा कर देते हैं। औरत के अधिकारों से अनभिज्ञ, अरब समाज मे प्यारे नबी सल्ल0 ने औरत को मर्द के बराबर दर्जा दिया। औरत का जायदाद और सम्पत्ति मे कोर्इ हक न था, आप स0 ने विरासत मे उसका हक नियत किया। औरत के हक और अधिकार बताने के लिए कुरआन मे निर्देश उतारे गये। मॉ-बाप और अन्य रिश्तेदारों की जायदाद में औरतों को भी वारिस घोषित किया गया। आज सभ्यता का राग अलापने वाले कर्इ देशों में औरत को न जायदाद का हक हैं न वोट देने का। इंग्लिस्तान में औरत को वोट का अधिकार 1928 र्इ0 पहली बार दिया गया। भारतीय समाज मे औरत को जायदाद का हक पिछले दिनों में हासिल हुआ। लेकिन हम देखते हैं कि आज से चौदह सौं वर्ष पूर्व ही ये सारे हक और अधिकार नबी स0 ने औरतों को प्रदान किये। कितने बड़े उपकार कर्ता हैं आप! आप स0 की शिक्षाओं में औरतों के हक पर काफी जोर दिया गया हैं। आप स0 ने ताकीद की लोग इस कर्तव्य से गाफिल न हो और न्यायसंगत रूप से औरत को मारा-पीटा न जाय। औरत के साथ कैसा बर्ताव किया जाय, इस सम्बन्ध मे नबी स0 की बातों का अवलोकन कीजिए: (1) अपनी पत्नी को मारने वाला अच्छे आचरण का नही हैं। (2) तुममें से सर्वश्रेष्ट व्यक्ति वह हैं जो अपनी पत्नी से अच्छी सूलूक करे। (3) औरतों के साथ अच्छे तरीके से पेश आपे का खुदा हुक्म देता हैं, क्योकि वे तुम्हारी मॉ, बहिन और बेटियॉ हैं। (4) मां के कदमों के नीचे जन्नत हैं। (5) कोर्इ मुसलमान अपनी पत्नी से नफरत न करें। अगर उसकी कोर्इ एक आदत बुरी हैं तो उसकी दूसरी अच्छी आदत को देख कर मर्द को खुश होना चाहिए। (6) अपनी पत्नी के साथ दासी जैसा व्यवहार न करो। उसको मारो भी मत। (7) जब तुम खाओं तो अपनी पत्नी को भी खिलाओं । जब तुम पहनो तो अपनी पत्नी को भी पहनाओं (8) पत्नी को ताने मत दों। चेहरे पर न मारो। उसका दिल न दुखाओं। उसकी छोड़कर न चले जाओं। (9) पत्नी अपने पति के स्थान पर समस्त अधिकारों की मालिक हैं। (10) अपनी पत्नियों के साथ जो अच्छी तरह बर्ताव करेंगे, वही तुम में सबसे बेहतर हैं। ठतने अधिकार प्रदान करके औरत को बिल्कुल आजाद भी नही छोड़ा, बल्कि उसे कुछ बातों का पाबन्द भी किया: 1-औरत इस तरह रहे कि जब उसका पति उसे देखे तो खुश हो जाय। जब कोर्इ हुक्म दे तो उसे पूरा करें। पति अगर दूर हो तो उसकी सम्पत्ति और अपने सतीत्व की सुरक्षा करें। ऐसी ही स्त्री आदर्श पत्नी समझी जायेगी। 2-सुशीला पत्नी का मिल जाना अमूल्य पूंजी के बराबर हैं। 3-जो पांचो समय की रोजाना नमाज पढ़े, रमजान के रोजे रखे और अपने पति का कहा माने तथा अपने सतीत्व की सुरक्षा करें, ऐसी औरत जिस रास्ते से चाहे जन्नत में प्रवेश करें। 4-दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा कीमती चीज पाक दामन बीबी हैं। इस तरह प्यारे नबी स0 ने औरतों को अधिकार भी दिये और उन्हे उनके कर्तव्यो से भी बाखबर किया। किसी को आपत्ति हो सकती हैं कि औरतों को इतने सारे अधिकार प्रदान करने वाले इस्लाम में बहुपत्नीवाद की अनुमति क्यों हैं? क्या यह औरतों पर खुला जुल्म नहीं हैं। इस सिलसिले में हमे इतिहास, पुरूष के स्वभाव और जिन्दगी के व्यावहारिक मसलों को सामने रखना होगा। हिन्दुस्तान के राजा दशरथ के कर्इ पतिनयां थी। इसी तरह कृष्णाजी को भी हम रूक्मिणी, सत्यबा और राधा के अलावा असंख्य गोपियों के बीच देखते हैं। बल्ली औरतों के साथ मरगन जैसे देवता को हम ऐश करते हुए पाते हैं। यह तो थी प्राचीन काल और पुराणों की बात, अब ऐतिहासिक घटनाओं को लीजिए। बड़े-बड़े राजाओं के यहॉ एक से अधिक पत्नियॉ होती थी। तमिलनाडू के कटटा बम्मन के घर कर्इ पत्नियां थी। आज भी कुछ राजनैतिक नेता कर्इ पत्नियां रखते हैं। इस्लाम से पहले अरब मे पत्नियों की संख्या पर कोर्इ हदबन्दी नही थी। प्यारे नबी ने मर्द के स्वभाव और अमली जरूरतों का ध्यान रख कर इस असीम संख्या को चार तक सीमित रखा। इस्लाम से पहले अरब दुनिया में शादी विवाह का कोर्इ विशेष नियम और सिद्धान्त न था। गिरोहो और कबीलों के बीच पत्नियॉ और दासियां रखने जब चाहा तलाक दे दी, इन हालात के सुधार के लिए खुदा के निर्देश आये, पत्नियों की संख्या को सीमित कर दिया गया और तलाक के सम्बन्ध में उचित नियमों और शिष्टाचार की पाबन्दी का हुक्म दियागया कुरआन में फरमाया गया। ‘‘ तुम्हे अगर आशंका हो कि यतीम बच्चो की परवरिश बगैर शादी किये न हो सकेगी तो अपनी पसन्द की दो, तीन या चार औरतों से तुम विवाह कर सकते हो (यह आशंका हो कि उनके साथ भी तुम न्याय न कर पाओगे तो) और औरत या दासी ही पर बस करो, अन्याय से बचने के लिए यह आसान तरीका हैं। (निसा 6) क्ुरआन की इस हिदायत मे जो हिकमते और भलार्इयां हैं उन पर भी विचार कीजिए। न्याय, इंसाफ तथा सच्चार्इ के साथ पत्नी से पेश आओ। बहुस्त्रीवाद की अनुमति भी हैं और इसी के साथ-साथ नाइंसाफी से बचने की ताकीद भी। न्याय और इन्साफ सम्भव न हो तो एक ही शादी पर जोर दिया गया हैं। मर्द को किसी भी समय अपनी काम तृष्णा की जरूरत पेश आ सकती हैं। इसलिए कि उसे कुदरत ने हर हाल मे हमेशा सहवास के योग्य बनाया हैं जबकि औरतों का मामला इससे भिन्न हैं। माहवारी के दिनो मे, गर्भावस्था में (नौ-दस माह) प्रसव के बाद के कुछ माह औरत इस योग्य नही होती कि उसके साथ उसका पति सम्भोग कर सके। सारे ही मर्दो से यह आशा रखना सही न होगा कि वे बहुत ही संयम और नियन्त्रण से काम लेंगे और जब तक उन की पत्नियां इस योग्य नही हो जाती कि वे उनके पास जायें, वे काम इच्छा को नियंत्रित रखेंगे। मर्द जायज तरीके से अपनी जरूरत पूरी कर सके, जरूरी है कि इसके लिए राहे खोली जायें और ऐसी तंगी न रखी जाय कि वह हराम रास्तों पर चलने पर विवश हों। पत्नी तो उसकी एक ही हो, आशना औरतों की कोर्इ कैद न रहे। इससे समाज मे जो गन्दगी फैलेगी और जिस तरह आचरण और चरित्र खराब होंगे इसका अनुमान लगाना आपके लिए कुछ मुश्किल नही हैं। व्यभिचार और बदकारी को हराम ठहराकर बहुस्त्रीवाद की कानूनी इजाजत देने वाला बुद्धिसंगत दीन इस्लाम हैं। एक से अधिक शादियों क मर्यादित रूप में अनुमति देकर वास्तव में इस्लाम ने मर्द और औरत की शारीरिक संरचना, उनकी मानसिक स्थितियों और व्यावहारिक आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा हैं और इस तरह हमारी दृष्टि में इस्लाम बिल्कुल एक वैज्ञानिक धर्म साबित होता हैं। यह एक हकीकत है, जिसपर मेरा दृढ़ और अटल विश्वास हैं। एक से अधिक शादियों क मर्यादित रूप में अनुमति देकर वास्तव में इस्लाम ने मर्द और औरत की शारीरिक संरचना, उनकी मानसिक स्थितियों और व्यावहारिक आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा हैं और इस तरह हमारी दृष्टि में इस्लाम बिल्कुल एक वैज्ञानिक धर्म साबित होता हैं। यह एक हकीकत है, जिसपर मेरा दृढ़ और अटल विश्वास हैं।

Tuesday, March 17, 2015

शुक्राणुहीनता NIL SPERM


पुरुष दिखनें में स्वस्थ हो ताकतवर हो लेकिन उसके शुक्राणु अगर कमजोर हैं तो वो गर्भ धारण नहीं करवा सकते - तो जानें वीर्य में स्वस्थ शुक्राणुओं को बढ़ाने के चंद उपाय - पुरुष के वीर्य में शुक्राणु होते हैं ये शुक्राणु स्त्री के डिम्बाणु को निषेचित कर गर्भ धारण के लिये जिम्मेदार होते हैं - वीर्य में इन शुक्राणुओं की तादाद कम होने को शुक्राणु अल्पता की स्थिति कहा जाता है। शुक्राणु अल्पता को ओलिगोस्पर्मिया कहते हैं लेकिन अगर वीर्य में शुक्राणुओं की मौजूदगी ही नहीं है तो इसे एज़ूस्पर्मिया संग्या दी जाती है ऐसे पुरुष संतान पैदा करने योग्य नहीं होते हैं। वीर्य में स्वस्थ शुक्राणुओं की तादाद कम होने के निम्न कारण हो सकते हैं-- * वीर्य का दूषित होना * अंडकोष पर गरमी के कारण वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम हो जाती है। ज्यादा तंग अन्डर वियर पहिनने,गरम पानी से स्नान करने, बहुत देर तक गरम पानी के टब में बैठने और मोटापा होने से शुक्राणु अल्पता हो जाती है। * हस्तमैथुन से बार बार वीर्य स्खलित करना * थौडी अवधि में कई बार स्त्री समागम करना * अधिक शारीरिक और मानसिक परिश्रम करना * ज्यादा शराब सेवन करना * अधिक बीडी सिगरेट पीना * गुप्तांग की दोषपूर्ण बनावट होना * शरीर में ज़िन्क तत्व की कमी होना * प्रोस्टेट ग्रंथि के विकार * वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बढाने के लिये निम्न उपाय करने का परामर्ष दिया जाता है-- * दो संभोग या हस्त मैथुन के बीच कम से कम ४ दिन का अंतराल रखें। * नियमित व्यायाम और योग करें। * शराब और धूम्रपान त्याग दें। * अधिक तीक्छण मसालेदार , अम्लता प्रधान और ज्यादा कडवे भोजन हानिकारक है। * ११ बादाम रात को पानी में भिगो दें। सुबह में छिलकर ब्लेन्डर में आधा गिलास गाय के दूध मे,एक चुटकी इलायची,केसर,अदरख भी डालकर चलाएं। यह नुस्खा वीर्य में शुक्राणुओं की तादाद बढाने का अति उत्तम उपाय है। * सफ़ेद प्याज का रस २ किलो निकालें ,इसमें एक किलो शहद मिलाकर धीमी आंच पर पकाएं। जब सिर्फ़ शहद ही बच जाए तो आंच से अलग करलें । इसमें ५०० ग्राम सफ़ेद मूसली का चूर्ण मिलाकर कांच या चीनी मिट्टी के बर्तन में भर लें। सुबह-शाम दो १० से २० ग्राम की मात्रा में लेते रहने से वीर्य में शुक्राणुओं का इजाफ़ा होता है और नपुंसकता नष्ट होती है। * गाजर का रस २०० ग्राम नित्य पीने से शुक्राणु अल्पता में उपकार होता है । * शतावर और असगंध के ५ ग्राम चूर्ण को एक गिलास दूध के साथ पीना बेहद फ़ायदेमंद है। * कौंच के बीज,मिश्री,तालमखाना तीनों बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनालें। ३-३ ग्राम चूर्ण सुबह शाम दूध के साथ लेने से शुक्राणु अल्पता समाप्त होकर पुरुषत्व बढता है। * गोखरू को दूध में ऊबालकर सुखावें। यह प्रक्रिया ३ बार करें। फ़िर सुखाये हुए गोखरू का चूर्ण बनालें। ५ ग्राम की मात्रा में उपयोग करने से मूत्र संस्थान के रोग ,नपुंसकता और शुक्राणु अल्पता मे आशातीत लाभ होता है। * याद रहे सुबह ४ बजे और अपरान्ह में शरीर में शुक्राणुओं का स्तर उच्चतम रहता है। अत: गर्भ स्थापना के लिये ये समय महत्व के हैं। * मशरूम में प्रचुर ज़िन्क होता है इसके सेवन से वीर्य में शुक्राणु बढते हैं ।इसमे डोपेमाईन होता है जो कामेच्छा जागृत करता है। * भोजन में लहसुन और प्याज शामिल करें। शुक्राणु की गुणवत्ता बढाने के लिए यह करे उपाय..... * अखरोट खाने से पुरूषों में शुक्राणुओं की संख्या और उसकी गुणवत्ता दोनों बढ सकती है। * वैज्ञानिकों ने 20 से 30 वर्ष उम्र सीमा के युवकों के एक समूह को तीन महीने के लिए रोज 75 ग्राम अखरोट खाने को कहा। अनुसंधानकर्ताओंने पाया कि अखरोट नहीं खाने वाले पुरूषों की तुलना में ऎसा करने वाले पुरूषों के शुक्राणुओं की संख्या में और उसकी गुणवत्ता दोनों में बढोतरी हुई और उनके पिता बनने की संभावनाएं भी बेहतर हुईं। * अनुसीअनसेचुरेटेड वसा का मुख्य स्त्रेत है। अखरोट में मछली में पाया जाने वाला ओमेगा-3 और ओमेगा-6 भी पर्याप्त मात्र में होता है। * माना जाता है कि यह दोनों शुक्राणु के विकास और उसकी कार्यप्रणाली के बहुत महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन ज्यादा पश्चिमी व्यंजनों में इसका अभाव होता है। प्रत्येक छह में से एक दंपति को गर्भधारण करने में समस्या आती है और ऎसा माना जा रहा है कि इसमें 40 प्रतिशत मामले पुरूष के शुक्राणु के कारण आते हैं।

Monday, December 8, 2014

इस्लाम के विरुद्ध जितना दुष्प्रचार हुआ, वह उतना ही फैला - राजेन्द्र नारायण लाल


.संसार के सब धर्मों में इस्लाम की एक विशेषता यह भी है कि इसके विरुद्ध जितना दुष्प्रचार हुआ किसी अन्य धर्म के विरुद्ध नहीं हुआ । सबसे पहले तो महाईशदूत मुहम्मद साहब की जाति कु़रैश ही ने इस्लाम का विरोध किया और अन्य कई साधनों के साथ दुष्प्रचार और अत्याचार का साधन अपनाया। यह भी इस्लाम की एक विशेषता ही है कि उसके विरुद्ध जितना दुष्प्रचार हुआ वह उतना ही फैलता और उन्नति करता गया तथा यह भी प्रमाण है—इस्लाम के ईश्वरीय सत्य-धर्म होने का। इस्लाम के विरुद्ध जितने दुष्प्रचार किए गए हैं और किए जाते हैं उनमें सबसे उग्र यह है कि इस्लाम तलवार के ज़ोर से फैला, यदि ऐसा ही है तो संसार में अनेक धर्मों के होते हुए इस्लाम चमत्कारी रूप से संसार में कैसे फैल गया? इस प्रश्न या शंका का संक्षिप्त उत्तर तो यह है कि जिस काल
में इस्लाम का उदय हुआ उन धर्मों के आचरणहीन अनुयायियों ने धर्म को भी भ्रष्ट कर दिया था। अतः मानव कल्याण हेतु ईश्वर की इच्छा द्वारा इस्लाम सफल हुआ और संसार में फैला, इसका साक्षी इतिहास है...।’’ ‘‘...इस्लाम को तलवार की शक्ति से प्रसारित होना बताने वाले (लोग) इस तथ्य से अवगत होंगे कि अरब मुसलमानों के ग़ैर-मुस्लिम विजेता तातारियों ने विजय के बाद विजित अरबों का इस्लाम धर्म स्वयं ही स्वीकार कर लिया। ऐसी विचित्र घटना कैसे घट गई? तलवार की शक्ति जो विजेताओं के पास थी वह इस्लाम से विजित क्यों हो गई...?’’ ‘‘...मुसलमानों का अस्तित्व भारत के लिए वरदान ही सिद्ध हुआ। उत्तर और दक्षिण भारत की एकता का श्रेय मुस्लिम साम्राज्य, और केवल मुस्लिम साम्राज्य को ही प्राप्त है। मुसलमानों का समतावाद भी हिन्दुओं को प्रभावित किए बिना नहीं रहा। अधिकतर हिन्दू सुधारक जैसे रामानुज, रामानन्द, नानक, चैतन्य आदि मुस्लिम- भारत की ही देन है। भक्ति आन्दोलन जिसने कट्टरता को बहुत कुछ नियंत्रित किया, सिख धर्म और आर्य समाज जो एकेश्वरवादी और समतावादी हैं, इस्लाम ही के प्रभाव का परिणाम हैं। समता संबंधी और सामाजिक सुधार संबंधी सरकरी क़ानून जैसे अनिवार्य परिस्थिति में तलाक़ और पत्नी और पुत्री का सम्पत्ति में अधिकतर आदि इस्लाम प्रेरित ही हैं...।’’ राजेन्द्र नारायण लाल (एम॰ ए॰ (इतिहास) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय) —‘इस्लाम एक स्वयंसिद्ध ईश्वरीय जीवन व्यवस्था’ पृष्ठ 40,42,52 से उद्धृत साहित्य सौरभ, नई दिल्ली, 2007 ई॰

Friday, November 28, 2014

I AM "RAM" BUT I AM NOT A "DHONGI BABA"


संत , बाबा और राम जैसे पवित्र शब्दों का आज रामपाल ,आशाराम, नित्यानंद जैसे लोगों ने पूरी तरह बदनाम कर दिया है इन जैसे लोगों के कारण ही लोग अय्याशी करने वालो की मिसाल "ये तो आशाराम का भी बाप निकला " कह कर देने लगे है संत रामपाल और आशाराम बापू
जैसे कितने ही बाबा, स्वामी और अन्य ढोंगियों के कारण ही आज पूरा संत समाज ही अपने आपको ठगा महसूस कर रहा है लोग इन लोगो के कारण पूरे संत समाज को ही शक की निगाह से देखने लगे है उनकी यह छवि विश्व्यापी बनती जा रही है इंटरनेट ने विश्व को इतना छोटा कर दिया है कि हर खबर लम्हों मे कही की कहीं पहुंचती है भारत को आध्यात्मिक विश्व गुरु के रूप मे देखने वाले लोग समझ नहीं पा रहे है कि माजरा क्या है कल शायद नौबत यहाँ तक आ पहुंचे कि हर बाबा को स्पष्टीकरण देना पड़े कि "मेरा नाम राम है पर मे ढोंगी बाबा नहीं हूँ "

Saturday, November 22, 2014

सरकार लोकपाल को नहीं ला पाई तो रामपाल को ले आयी


आओ रामपालो ! मोदी और अदानी को मदद करो सरकार लोकपाल को नहीं ला पाई तो रामपाल को ले आयी। बरवाला का इस बड़बोला से गहरा नाता है। प्रशासन पर रामपाल का आक्रमण और मोदी का विदेश भ्रमण का इंटर- कनेक्शन है।... पूरा आलेख पढने के लिए देखें http://www.hastakshep.com/intervention-hastakshep/ajkal-current-affairs/2014/11/21/%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A5%80%E0%A4%9B%E0%A5%87-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B8%E0%A4%9A-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%94?utm_source=feedburner&utm_medium=feed&utm_campaign=Feed%3A+Hastakshepcom+%28Hastakshep.com%29

Wednesday, September 10, 2014

सोरायसिस (अपरस), (छालरोग) भयानक चर्म रोग PSORISIS


सोरियासिस एक प्रकार का चर्म रोग है जिसमें त्वचा में सेल्स की तादाद बढने लगती है।चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडियां उत्पन्न हो जाती हैं। ये पपडिया ं सफ़ेद चमकीली हो सकती हैं।इस रोग के भयानक रुप में पूरा शरीर मोटी लाल रंग की पपडीदार चमडी से ढक जाता है।यह रोग अधिकतर केहुनी,घुटनों और खोपडी पर होता है। अच्छी बात ये कि यह रोग छूतहा याने संक्रामक किस्म का नहीं है। रोगी के संपर्क से अन्य लोगों को कोई खतरा नहीं है। माडर्न चिकित्सा में अभी तक ऐसा परीक्षण यंत्र नहीं है जिससे सोरियासिस रोग का पता लगाया जा सके। खून की जांच से भी इस रोग का पता नहीं चलता है। यह रोग वैसे तो किसी भी आयु में हो सकता है लेकिन देखने में ऐसा आया है कि १० वर्ष से कम आयु में यह रोग बहुत कम होता है। १५ से ४० की उम्र वालों में यह रोग ज्यादा प्रचलित है। लगभग १ से ३ प्रतिशत लोग इस बीमारी से पीडित हैं। इसे जीवन भर चलने वाली बीमारी की मान्यता है। चिकित्सा विग्यानियों को अभी तक इस रोग की असली वजह का पता नहीं चला है। फ़िर भी अनुमान लगाया जाता है कि शरीर के इम्युन सिस्टम में व्यवधान आ जाने से यह रोग जन्म लेता है।इम्युन सिस्टम का मतलब शरीर की रोगों से लडने की प्रतिरक्षा प्रणाली से है। यह रोग आनुवांशिक भी होता है जो पीढी दर पीढी चलता रहता है।इस रोग का विस्तार सारी दुनिया में है। सर्दी के दिनों में इस रोग का उग्र रूप देखा जाता है। कुछ रोगी बताते हैं कि गर्मी के मौसम में और धूप से उनको राहत मिलती है। एलोपेथिक चिकित्सा मे यह रोग लाईलाज माना गया है। उनके मतानुसार यह रोग सारे जीवन भुगतना पडता है।लेकिन कुछ कुदरती चीजें हैं जो इस रोग को काबू में रखती हैं और रोगी को सुकून मिलता है। मैं आपको एसे ही उपचारों के बारे मे जानकारी दे रहा हूं---
१) बादाम १० नग का पावडर बनाले। इसे पानी में उबालें। यह दवा सोरियासिस रोग की जगह पर लगावें। रात भर लगी रहने के बाद सुबह मे पानी से धो डालें। यह उपचार अच्छे परिणाम प्रदर्शित करता है। २) एक चम्मच चंदन का पावडर लें।इसे आधा लिटर में पानी मे उबालें। तीसरा हिस्सा रहने पर उतारलें। अब इसमें थोडा गुलाब जल और शकर मिला दें। यह दवा दिन में ३ बार पियें।बहुत कारगर उपचार है। ३) पत्ता गोभी सोरियासिस में अच्छा प्रभाव दिखाता है। उपर का पत्ता लें। इसे पानी से धोलें।हथेली से दबाकर सपाट कर लें।इसे थोडा सा गरम करके प्रभावित हिस्से पर रखकर उपर सूती कपडा लपेट दें। यह उपचार लम्बे समय तक दिन में दो बार करने से जबर्दस्त फ़ायदा होता है। ४) पत्ता गोभी का सूप सुबह शाम पीने से सोरियासिस में लाभ होते देखा गया है।प्रयोग करने योग्य है। ५) नींबू के रस में थोडा पानी मिलाकर रोग स्थल पर लगाने से सुकून मिलता है। नींबू का रस तीन घंटे के अंतर से दिन में ५ बार पीते रहने से छाल रोग ठीक होने लगता है। ६)शिकाकाई पानी मे उबालकर रोग के धब्बों पर लगाने से नियंत्रण होता है। ७) केले का पत्ता प्रभावित जगह पर रखें। ऊपर कपडा लपेटें। फ़ायदा होगा। ८) कुछ चिकित्सक जडी-बूटी की दवा में steroids मिलाकर ईलाज करते हैं जिससे रोग शीघ्रता से ठीक होता प्रतीत होता है। लेकिन ईलाज बंद करने पर रोग पुन: भयानक रूप में प्रकट हो जाता है। ट्रायम्सिनोलोन स्टराईड का सबसे ज्यादा व्यवहार हो रहा है। यह दवा प्रतिदिन १२ से १६ एम.जी. एक हफ़्ते तक देने से आश्चर्यजनक फ़ायदा दिखने लगता है लेकिन दवा बंद करने पर रोग पुन: उभर आता है। जब रोग बेहद खतरनाक हो जाए तो योग्य चिकित्सक के मार्ग दर्शन में इस दवा का उपयोग कर नियंत्रण करना उचित माना जा सकता है।
९) इस रोग को ठीक करने के लिये जीवन शैली में बदलाव करना जरूरी है। सर्दी के दिनों में ३ लीटर और गर्मी के मौसम मे ५ से ६ लीटर पानी पीने की आदत बनावें। इससे विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेंगे। १०) सोरियासिस चिकित्सा का एक नियम यह है कि रोगी को १० से १५ दिन तक सिर्फ़ फ़लाहार पर रखना चाहिये। उसके बाद दूध और फ़लों का रस चालू करना चाहिये। ११) रोगी के कब्ज निवारण के लिये गुन गुने पानी का एनीमा देना चाहिये। इससे रोग की तीव्रता घट जाती है। १२) अपरस वाले भाग को नमक मिले पानी से धोना चाहिये फ़िर उस भाग पर जेतुन का तेल लगाना चहिये। १४) खाने में नमक वर्जित है। १५) पीडित भाग को नमक मिले पानी से धोना चाहिये। १६) धूम्रपान करना और अधिक शराब पीना विशेष रूप से हानि कारक है। ज्यादा मिर्च मसालेदार चीजें न खाएं।

Tuesday, September 9, 2014

बवासीर


मित्रों बवासीर ऐसा रोग है जो किसी भी व्यक्ति का रात दिन का चैन सुकून छीन लेता है.....आयुर्वेद में इसका सफल इलाज संभव है यदि पथ्यापथ्य का ध्यान रखा जाए
............... पाइल्स (बवासीर, अर्श): वात, पित, कफ़ ये तीनो दोष त्वचा, मांस, मेदा को दूषित करके गुदा के अंदर और बाहरी स्थानों मैं मांस के अंकुर (मस्से/फफोले) तैयार करते हैं. इन्ही मांस के अंकुरों को बवासीर या अर्श कहते हैं ! ये मांस के अंकुर गुदामार्ग का अवरोध करते हैं और मलत्याग के समय शत्रु की भांति पीड़ा करते हैं ! इसलिए इनको अर्श भी कहा जाता है. ( चरक) बवासीर का सबसे उत्तम उपचार आयुर्वेद के द्वारा ही किया जा सकता है ! आयुर्वेदिक उपचार एक बहुत ही सुलझा और बिना साइड इफ़ेक्ट का उपचार है ! पाइल्स को पूरी तरह से आयुर्वेदिक तरीके से ही ठीक किया जा सकता है| बाहरी लक्षणों के कारण भेद: बवासीर 2 प्रकार (kind of piles) की होती हैं। एक भीतरी(खूनी) बवासीर तथा दूसरी (बादी) बाहरी बवासीर। भीतरी / ख़ूनी बवासीर / आन्तरिक / रक्‍त स्रावी अर्श / रक्तार्श ख़ूनी बवासीर में मलाशय की आकुंचक पेशी के अन्दर अर्श होता है तो वह म्युकस मेम्ब्रेन (Mucous Membrane) से ढका रहता है। ख़ूनी बवासीर में किसी प्रक़ार की तकलीफ नहीं होती है केवल ख़ून आता है। पहले मल में लगके, फिर टपक के, फिर पिचकारी की तरह से सिर्फ़ ख़ून आने लगता है। इसके अन्दर मस्सा होता है। जो कि अन्दर की तरफ होता है फिर बाद में बाहर आने लगता है। मलत्याग के बाद अपने से अन्दर चला जाता है। पुराना होने पर बाहर आने पर हाथ से दबाने पर ही अन्दर जाता है। आख़िरी स्टेज में हाथ से दबाने पर भी अन्दर नहीं जाता है। भीतरी बवासीर हमेशा धमनियों और शिराओं के समूह को प्रभावित करती है। फैले हुए रक्त को ले जाने वाली नसें जमा होकर रक्त की मात्रा के आधार पर फैलती हैं तथा सिकुड़ती है। इस रोग में गुदा की भीतरी दीवार में मौजूद ख़ून की नसें सूजने के कारण तनकर फूल जाती हैं। इससे उनमें कमज़ोरी आ जाती है और मल त्याग के वक़्त ज़ोर लगाने से या कड़े मल के रगड़ खाने से ख़ून की नसों में दरार पड़ जाती हैं और उसमें से ख़ून बहने लगता है। इस बवासीर के कारण मस्सों से ख़ून निकलने लगता है। यह बहुत भयानक रोग है, क्योंकि इसमें पीड़ा तो होती ही है साथ में शरीर का ख़ून भी व्यर्थ नष्ट होता है। बाहरी / बादी बवासीर / अरक्‍त स्रावी या ब्राह्य अर्श बादी बवासीर रहने पर पेट ख़राब रहता है। कब्ज बना रहता है। गैस बनती है। इसमें जलन, दर्द, खुजली, शरीर मै बेचैनी, काम में मन न लगना इत्यादि। मल कडा होने पर इसमें ख़ून भी आता है। इसमें मस्सा अन्दर होने की वजह से मल का रास्ता छोटा पड़ता है और चुनन फट जाती है और वहाँ घाव हो जाता है उसे फिशर भी कहते हें। जिससे असहाय जलन और पीडा होती है। बवासीर बहुत पुराना होने पर भगन्दर हो जाता है। जिसे अंग़जी में फिस्टुला कहते हें। फिस्टुला कई प्रक़ार का होता है। भगन्दर में मल के रास्ते के बगल से एक छेद हो जाता है जो मल की नली में चला जाता है। और फोड़े की शक्ल में फटता, बहता और सूखता रहता है। कुछ दिन बाद इसी रास्ते से मल भी आने लगता है। बवासीर, भगन्दर की का इलाज़ अगर ज्यादा समय तक ना करवाया जाये तो केंसर का रूप भी ले सकता है। जिसको रिक्टम केंसर कहते हें। जो कि जानलेवा साबित होता है। ऐसा होने की सम्भावना बहुत ही कम होती है | बवासीर के भेद/प्रकार: जन्म के बाद हमारे शारीरिक त्रिदोषों के कारण बवासीर के छः भेद हैं ! जिनमे १. तीनो दोषों (वात, पित,कफ़) से अलग -२ से तीन प्रकार की होती है! २. सहज (जन्म) से एक ! ३. त्रिदोष दोषों से एक ! ४. रक्त दोष से एक ! वात अर्श : वात से उत्पन्न अर्श के मांस अंकुर शुष्क, चिम्चिमाह्ट वाले, मुरझाये हुए, श्वेत, लाल और छोटे- बड़े, उप्पेर नीचे, और तीरछे होते हैं. इनका आकार कंदूरी, बेर. खर्जूर के फुल के सम्मान होता है! और रोगी रुक-२ कर बहुत मुश्किल से बंधा हुआ मॉल त्याग करता है ! पित अर्श: पित प्रधान अर्श मैं मांस के अंकुर नीले मुख के, लाल, पीले, या कालिख लिए होते हैं. इनसे, स्वच्छ, पतला, रक्त (ब्लड) बहता है ! और दुर्गन्ध भी आती है! ये मांस के अंकुर ढीले, पतले, कोमल, तोते की जीभ, जोंन्क (लीच) के मुख के समान होते हैं ! रोगी पतला, नीला, गर्म, पीला या रक्त और आम से युक्त मल त्याग करता है ! मल त्याग के समय असहनीय पीड़ा होती है ! कफ़ अर्श: कफ प्रधान बवासीर के मस्से अंकुर मूल से मोटे, स्थूल, मंद पीड़ा वाले और श्वेत (वाइट) रंग के होते हैं ! लम्बे, नर्म, गोल, बड़े, चिकने होते हैं और छूने से सुख का अनुभव कराने वाले होते हैं ! इनका आकार करीर या कटहल के बीज या गाये के स्तन के समान होता है! रोगी बसा की भांति कफ़युक्त और बहुत कम मात्र मैं मल का त्याग करता है ! थोडा पित मैं मरोड़ के साथ मल आता है. ये मांस अंकुर/ मस्से न बहते हैं न फूटते हैं. त्रिदोष और सहज अर्श : तीनो दोषों के मिश्रण से उत्पन्न बवासीर के मांस अंकुर उपर लिखित तीनो दोषों से युक्त लक्षण वाले होते हैं! रक्त दोष अर्श : रक्त की अधिकता वाले मांस अंकुर पित से उत्पन अर्श अंकुरों के समान होते है !बरगद के अंकुर, गुंजा या प्रवाल की तरह ये अंकुर होते हैं! मल त्याग के समय इन मांस अंकुरों से बहुत दूषित और गर्म रक्त (खून) एकदम से बहने लगता है! इस रक्त के ज्यादा बहने से रोगी कमजोरी महसूस करता है ! पाइल्स की उत्पति के कारण…….. पाइल्स या बवासीर को आधुनिक सभ्यता का विकार कहें तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। खाने पीने मे अनिमियता, जंक फ़ूड का बढता हुआ चलन और व्यायाम का घटता महत्त्व, लेकिन और भी कई कारण हैं बवासीर के रोगियों के बढने में। पाइल्स होने के मुख्या कारण निम्नलिखित हैं - कब्ज- बवासीर रोग होने का मुख्य कारण पेट में कब्ज बनना है। दीर्घकालीन कब्ज बवासीर की जड़ है। 50 से भी अधिक प्रतिशत व्यक्तियों को यह रोग कब्ज के कारण ही होता है। सुबह-शाम शौच न जाने या शौच जाने पर ठीक से पेट साफ़ न होने और काफ़ी देर तक शौचालय में बैठने के बाद मल निकलने या ज़ोर लगाने पर मल निकलने या जुलाब लेने पर मल निकलने की स्थिति को कब्ज होना कहते हैं। इसलिए जरूरी है कि कब्ज होने को रोकने के उपायों को हमेशा अपने दिमाग में रखें। कब्ज की वजह से मल सूखा और कठोर हो जाता है जिसकी वजह से उसका निकास आसानी से नहीं हो पाता। मलत्याग के वक़्त रोगी को काफ़ी वक़्त तक पखाने में उकडू बैठे रहना पड़ता है, जिससे रक्त वाहनियों पर ज़ोर पड़ता है और वह फूलकर लटक जाती हैं। कब्ज के कारण मलाशय की नसों के रक्त प्रवाह में बाधा पड़ती है जिसके कारण वहां की नसें कमज़ोर हो जाती हैं और आन्तों के नीचे के हिस्से में भोजन के अवशोषित अंश अथवा मल के दबाव से वहां की धमनियां चपटी हो जाती हैं तथा झिल्लियां फैल जाती हैं। जिसके कारण व्यक्ति को बवासीर हो जाती है। यह रोग व्यक्ति को तब भी हो सकता है जब वह शौच के वेग को किसी प्रकार से रोकता है। भोजन में आवश्यक पोषक तत्वों की कमी होने के कारण बिना पचा हुआ भोजन का अवशिष्ट अंश मलाशय में इकट्ठा हो जाता है और निकलता नहीं है, जिसके कारण मलाशय की नसों पर दबाव पड़ने लगता हैं और व्यक्ति को बवासीर हो जाती है। गरिष्ठ भोजन - अत्यधिक मिर्च, मसाला, तली हुई चटपटी चीज़ें, मांस, अंडा, रबड़ी, मिठाई, मलाई, अति गरिष्ठ तथा उत्तेजक भोजन करने के कारण भी बवासीर रोग हो सकता है। अधिक भोजन - अतिभोजन अर्श रोग मूल कारणम्‌ अर्थात्‌ आवश्यकता से अधिक भोजन करना बवासीर का प्रमुख कारण है। शौच करने के बाद मलद्वार को गर्म पानी से धोने या अच्छी तरह से ना धोने से भी बवासीर रोग हो सकता है। दवाईयों का अधिक सेवन करने के कारण भी यह रोग व्यक्ति को हो सकता है। डिस्पेपसिया और किसी जुलाब की गोली का अधिक दिनॊ तक सेवन करना। रात के समय में अधिक जगना भी बवासीर का के होने का एक मुख्या कारण है | रात को जागने से शरीर की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और कब्ज को पैदा करती है| कुछ व्यक्तियों में यह रोग पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता है। अतः अनुवांशिकता इस रोग का एक कारण हो सकता है। जिन व्यक्तियों को अपने रोज़गार की वजह से घंटों खड़े रहना पड़ता हो, जैसे बस कंडक्टर, ट्रॉफिक पुलिस, पोस्टमैन या जिन्हें भारी वजन उठाने पड़ते हों,- जैसे कुली, मजदूर, भारोत्तलक वगैरह, उनमें इस बीमारी से पीड़ित होने की संभावना अधिक होती है। बवासीर गुदा के कैंसर की वजह से या मूत्र मार्ग में रूकावट की वजह से या गर्भावस्था में भी हो सकता है। गर्भावस्था मे भ्रूण का दबाब पडने से स्त्रियों में यह रोग अकसर हो जाता है | बवासीर मतलब पाइल्स यह रोग बढ़ती उम्र के साथ जिनकी जीवनचर्या बिगड़ी हुई हो, उनको होता है। सुबह देर से उठना, रात को देर से सोना और समय पर भोजन न करना, जैसे अव्यब्स्थित दिनचर्या इसका मुख्या कारण है| यकृत :- पाचन संस्थान का यकृत सर्वप्रधान अंग है। इसके भीतर तथा यकृत धमनी आदि में पोर्टल सिस्टम रक्‍त की अधिकता होकर यह रोगित्पन्‍न होता है। जैसे – सिरोसिस आफ़ लिवर। हृदय की कुछ बीमारियाँ। उदरामय - निरन्तर तथा तेज उदरामय निश्‍चित रूप से बवासीर उत्पन्‍न करता है। मद्यपान एवं अन्य नशीले पदार्थों का सेवन – अत्यधिक शराब, ताड़ी, भांग, गांजा, अफीम आदि के सेवन से बवासीर होता है। चाय एवं धूम्रपान - अधिकाधिक चाय, कॉफी आदि पीने तथा दिन रात धूम्रपान करने से अर्शोत्पत्ति होती है। पेशाब संस्थान - मूत्राशय की गड़बड़ी, पौरुष ग्रन्थि की वृद्धि, मूत्र पथरी आदि रोग में पेशाब करते समय ज़्यादा ज़ोर लगाने के कारण” भी यह रोग होता है। मल त्याग के समय या मूत्र नली की बीमारी मे पेशाब करते समय काँखना। शारीरिक परिश्रम का अभाव - जो लोग दिन भर आराम से बैठे रहते हैं और शारीरिक श्रम नहीं करते उन्हें यह रोग हो जाता है। क्या न करें : चाय, कॉफ़ी, ठंडा कोल्ड ड्रिंक,जूस और गर्म कोई भी बाहरी पेय पदार्थ न पीयें| बाहर का बना हुआ जंक फ़ूड या कोई भी वास्तु ना ! हमेशा घर का बना हुआ खाना ही खायें | इलाज़ के दौरान कोई भी खट्टी (इमली, टमाटर, आचार, नीम्बू, दहीं, छाछ, मौसमी, और इस तरह की कोई भी) चींजों का सेवेन बिळकुल ना करें ! किसी भी तरह के मांसाहारी भोजन (मांस, मछली, अंडा, समुद्री भोजन) का सेवन न करें ! ना ही मांसाहारी पेय जैसे सूप आदि का सेवन न करें | इलाज़ के दौरान खाने में मिर्ची का प्रयोग बिलकुल न करें ! मिर्च किसी भी रूप (लाल, हरी, पाउडर, खड़ी) में न करें ! उपचार के दौरान तला हुआ, मसालेदार, और तड़का लगा हुआ खाना किसी भी रूप मैं न खाएं ! उबला हुआ खाना ही खाएं | इलाज़ के दौरान दूध से बनी हुयी भारी चीजों का सेवेन ना करें जैसे : चीज़, पनीर, खोया, दही, लस्सी, मिठाई, आदि ! दूध का सेवन दिन मैं एक बार किया जा सकता है ! इलाज़ के दौरान बेकरी की बनी हुयी कोई भी चीजें न खाएं जैसे : बिस्कुट, कूकीज, ब्रेड, केक, सैंडविच, बर्गर, पिज़्ज़ा आदि ! उपचार के दौरानभारी दालें जैसे : उरद, राजमाहा,रोंगी, सोयाबीन आदि का सेवन बिलकुल ना करें ! शराब का सेवेन बिलकुल भी न करें, धूम्रपान और तम्बाकू का सेवेन जितना हो सके उतना न करने की कोशिश करें ! उपचार के दौरान कोई भी भारी व्यायाम या काम न करें जैसे : भार उठाना, लम्बी दूरी की दौड़, आदि ! हल्का व्यायाम और योगा जरूर कीजिये ! योगा मैं आप प्राणायाम, शीर्शाशन, सूर्य नमस्कार दिन में १ घंटा जरूर करें! लम्बी यात्रा न करें ! ज्यादा देर तक बैठ कर या खड़े हो कर काम न करें ! हर एक घंटे बैठने के बाद १० मिनट के लिए इधर-उधर घूमे ! या हर एक घंटे खड़े रहने पैर थोड़ी देर के लिए बैठ जायें! देर रात तक काम न करें और सुबह देर तक सोते न रहिएँ ! जल्दी सोयें (8:30 – 9:00PM) और जल्दी उठें ( 4:00 – 4:30AM) ! क्या करें: खूब पानी पीयें ! कम से कम 4 – 5 लीटर पानी पीयें ! पानी एक साथ न पीयें ! एक बार मैं 100 मिलीलीटर से जयादा न पीयें ! सुबह – शाम एक-२ गिलास गरम पानी का पीयें ! नारियल का पानी जितना पी सकते हैं उतना पीयें! उपचार के दौरान मूली का रस/जूस दिन में तीन बार पीयें ! एक बार में 50 – 100 मिलीलीटर पीयें ! (हर रोज़ पीना जरूरी है) इलाज़ के दौरान हल्का, सादा, बिना तेल का, ताजा, और उबला हुआ खाना ही खाएं ! खाना बनाते समय तेल/घी, और बाजारू पीसे हुए मसालों का प्रयोग न करें ! खाना घर में ही बना कर खायें! उपचार के दौरान सब्जियों मैं मूली, शलगम, चुकंदर, बैगन, पत्तेदार सब्जियां जैसे सरसों, मूली, चोलाई, बिथुआ, मैथी, पालक, बंदगोभी, गाजर, करेला, लौकी, तोरी, ककड़ी, भिन्डी आदि का सेवन करें ! सब्जियों को उबाल कर ही खायें और बिना तेल से ही तैयार करें! उपचार के दौरान हल्की, सादी और उबली हुयी दालों का सेवेन करें ! दालों में चना दाल, अरहर दाल, मसूर दाल, साबुत मूंग, मूंग दाल, आदि का सेवन ही करें ! दालें उबाल केर ही पकायें और तेल आदि का इस्तेमाल बिलकुल न करें ! इलाज़ के दौरान फलों में पपीता, तरबूज, अमरुद, अंजीर, नाशपाती, सेब, आडू, नारियल आदि का सेवेन करें ! फलों का जुके पीयें! अंकुरित मूंग और चना का सेवेन दिन में एक बार जरूर करें ! (50 – 100 ग्राम) अंकुरित मूंग और चन्ना की सब्जी या सूप पीयें. दाल, सब्जी या सूप बनाते समय थोडा सा कच्छा अदरक, काची हल्दी, चुटकी भर अज्वायेंन, जीरा, मैथी दाना, जर्रो डालें ! दाल, सब्जी और सूप उबला हुआ ही खायें! खाने मैं तड़का न दें ! उपचार के दौरान रात को सोने से पहले एक चमच त्रिफला पाउडर गरम पानी के साथ जरूर सेवेन करें ! खाने के सुझाव: नाश्ता : नाश्ते में दूध में बना दलिया/पोहा/जौ या जई/रवा इडली (चावल और दाल वाली इडली नहीं)/कॉर्न फलैक्स/फल-सब्जी का सलाद/उपमा/अंकुरित मूंग और चना/अंकुरित चना और मूंग का सूप आदि ! खाना (दिन) : मूंग और चावल (अगर लाल चावल हैं तो अच्छा है) की खिछ्डी/सब्जियां और गेंहू/बाजरा/कोदरा/रागी/ज्वार आदि के आटे की रोटी ! खाना (रात): कोई भी उपर लिखी दाल/सब्जी चावल या गेंहू/बाजरा/कोदरा/रागी/ज्वार आदि के आटे की रोटी के साथ सेवन करें ! सब्जी में घर का बना हुआ मक्खन १/२ चमच डाल सकते हैं. बाजारू मक्खन/घी न डालें ! बवासीर की चिकित्सा -------------------- आयुर्वेद की औषधि “अर्श कुठार रस” की दो गोली सुबह और शाम मठे के साथ अथवा दही की पतली नमकीन लस्सी के साथ रोजाना १२० दिन तक ले अथवा सेवन करें / भोजन के बाद आयुर्वेद की शास्त्रोक्त दवा ” अभयारिष्ट” और “रोहितिकारिष्ट” चार चम्म्च लेकर इसके बराबर चार चम्मच सादा पानी मिलाकर lunch और dinner के बाद दोनों समय सेवन करें /

Saturday, July 27, 2013

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय महासचिव मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि हजरत शेखुल हिंद की खिदमात और रेशमी रुमाल की तहरीक के सौ वर्ष पूरे होने पर जमीयत द्वारा देवबंद में विशाल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जाएगा। मदनी मंजिल पर आयोजित जमीयत उलेमा-ए-हिंद की बैठक में बोलते हुए मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जंग-ए-आजादी में शेखुल हिंद द्वारा दिए गए योगदान को कभी नहीं भूलाया जा सकता। तहरीक रेशमी रुमाल पर विस्तार से रोशनी डालते हुए उन्होंने कहा कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद की मजलिस ए आमला (वर्किंग कमेटी) द्वारा यह निर्णय लिया गया था कि शेखुल हिंद की सेवाओं को उजागर करने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों में 100 कॉन्फ्रेंस आयोजित की जाएगी। जमीयत द्वारा 80 सफल कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया जा चुका है तथा रेशमी रुमाल की तहरीक के सौ वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आगामी नवंबर माह में 100वीं कॉन्फ्रेंस देवबंद में विशाल रूप में आयोजित की जाएगी। उन्होंने बताया कि इजलास में देश विदेश के प्रमुख उलेमा समेत करीब 10 लाख लोगाों के भाग लेने की संभावना है। बैठक में 100वीं कॉन्फ्रेंस हेतू स्थान नियुक्त करने के लिए दस सदस्यीय कमेटी का गठन किया भी गया। बैठक की अध्यक्षता मौलाना महमूद मदनी व संचालन मौलाना हसीब सिद्दीकी ने किया। इस मौके पर चौ. सादिक, उमैर उस्मानी, हाजी खलील, अब्दुल सत्तार, मुल्ला अकरम कुरैशी, मौ. इनाम कुरैशी, हाजी मोहम्मद जैद, सदरुद्दीन अंसारी, मौलाना मोहम्मद मदनी, नौशाद प्रधान, साबिर अली प्रधान, सलीम उस्मानी, डॉ. अब्दुल रऊफ आदि मौजूद रहे।

Thursday, July 18, 2013

The Essence of Fasting रोज़े का महत्व

रमजान के पवित्र महीने में रोज़े रखना धार्मिक काम है जो आत्मा को शुद्ध करता है और इंसान को खुदा के साथ एक स्थायी सम्बंध के लिए तैयार करता है जहां अल्लाह का खौफ़ हावी रहता है। अगर ईमानदारी और विश्वास के साथ रोज़ा रखा जाये तो रोज़ा सबसे बढ़कर एक अच्छा इंसान बनने में हमारी मदद करता है। इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि सभी धर्मों ने इस तरह या दूसरे तरीके से रोज़ा रखने का हुक्म दिया है। ये आमतौर पर जाना जाता है कि रोज़ा इस्लाम के पांच स्तम्भों में से एक है (अन्य चार ईमान, नमाज़, हज और ज़कात हैं)।

रमज़ान का पवित्र महीना इबादत का महीना है, सदक़े (दान) का महीना है, परहेज़गारी (धर्मपरायणता) का महीना है, कुरान का महीना है और सबसे बढ़कर ये आत्मावलोकन और खुद के सुधार का महीना है। यही वो महीना है कि जिसमें मुसलमान सभी अच्छे काम, हर ज़रिए, हर तरीके, हर जगह और उन सभी लोगों के साथ करने की कोशिश करते हैं जिनके साथ वो कर सकते हैं। तमाम नेकियाँ करो' के मक़सद के साथ आज सभी मुसलमानों को एक अच्छा इंसान बनने के लिए सामूहिक प्रयास करने, नैतिकता में बेहतरी को हासिल करने, अपने सामान्य व्यवहार में सुधार करने, असाधारण शक्ति वाली नैतिक भावना पैदा करने और एक ऐसा विश्वास हासिल करना ज़रूरी है कि जिससे वो अच्छाई और बुराई में भेद कर सकें, हालांकि सच्चाई हमेशा जल्दी हासिल नहीं होती है। ये इस समय और इस पवित्र महीने की वास्तविक ज़रूरत है।

इस्लाम के बुनियादी नैतिक मूल्य ये हैं: करुणा, दया और शांति। हमारे दिल व दिमाग़ में अल्लाह के खौफ के साथ अपनी धार्मिकता के लिए जो कि रोज़े से पैदा होती है और इस्लाम के नैतिक मूल्यों से लैस मुसलमान दुनिया को साधने के लिए चमत्कार कर सकते हैं और अपने खोए हुए गौरव को हासिल कर सकते हैं। सबसे पहले जो बात दिमाग में आती है, करुणा है और किस तरह ये हमें अच्छा इंसान बना सकती है। हमदर्दी का उसूल सभी धर्मों, नैतिकताओं और आध्यात्मिक परंपराओं का प्रमुख हिस्सा होता है, जो कि हम दूसरों से ऐसे बर्ताव की अपेक्षा करते हैं जैसा कि हम अपने लिए दूसरों से चाहते हैं। सहानुभूति हमें हमारे साथी प्राणियों के दुखों का अंत करने के लिए अथक संघर्ष करने की प्रेरणा देता है। हमे अपनी दुनिया के केंद्र से खुद को उतारने और उस जगह दूसरों को स्थापित करने की प्रेरणा देता है। और सभी इंसानों के आदर और सम्मान की प्रेरणा देता है। किसी अपवाद के बिना सभी के साथ पूर्ण न्याय, समानता और सम्मान के साथ पेश आने की प्रेरणा देता है। सार्वजनिक और निजी दोनों जीवन में निरंतर दूसरों को तकलीफ पहुँचाने से बचना ज़रूरी है। द्वेष करना, अंध देश-भक्ति या व्यक्तिगत लाभ के लिए हिंसक काम करना और किसी को उसके मौलिक अधिकारों से वंचित करना और किसी को बदनाम करके नफ़रत भड़काना, यहां तक कि दुश्मन के साथ भी ऐसा बर्ताव करना- हमारी साझा मानवता से इन्कार है।

इस्लाम में प्रेम की परंपरा के बारे में अपना अध्ययन शुरू करने के लिए सबसे अच्छी जगह निश्चित रूप से कुरान और पैगम्बर मोहम्मद सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम का जीवन है। मुसलमानों को दुनिया के सभी अजूबों में खुदा के कृपालू होने के लक्षण (आयतें) पर ग़ौर करना ज़रूरी है। क्योंकि अल्लाह की उदारता की वजह से व्यवस्था और उर्वरता है, जिसमें कि अराजकता और बंजरपन हो सकता था। जैसे उन्होंने खुदा के दया भाव की सराहना करना सीखा है। मुसलमानों के अंदर भी इसकी नकल करने का रूझान पैदा होगा। वो भी खुदा के पैदा किये सभी प्राणियों के साथ मोहब्बत से पेश आना चाहेंगे और मेहरबान और जिम्मेदारी के गुण को चरमोत्कर्ष पर ले जाते हुए, खासकर समाज के कमज़ोर और वंचित वर्ग के लिए स्नेह और नेकी के लबादे में खुद को ढालना चाहेंगे।

कुरान की तिलावत अल्लाह, रहमान और रहीम से एक दुआ के साथ शुरू होती है। कुरान का मूल संदेश व्यावहारिक दयालुता और सामाजिक न्याय के लिए एक निमंत्रण है। दौलत जमा करना गलत है और निष्पक्ष तरीके से अपने धन को खर्च करना अच्छा है, और एक ऐसे सभ्य समाज के निर्माण के लिए संघर्ष करना अच्छा है, जहां सबका सम्मान किया जाए। हुज़ूर सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के मिशन की शुरुआत से ही गरीबों को ज़कात देने को मुसलमानों की ज़िंदगी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। ईमान (विश्वास) सिर्फ खुदा के बारे में सिद्धांतों के संकलन को तार्किक रूप से स्वीकार करना नहीं है। कुरान की प्रारंभिक सूरतों में बार बार इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि मोमिन मर्द या औरत वो हैं जिन्होंने "इंसाफ के आमाल (कार्यों)" (सालेहात) अंजाम दिए। सभी मुसलमान इसे जानते हैं लेकिन हमें इन बुनियादी हक़ीक़तों से खुद को आगाह करने के लिए एक सचेत प्रयास की ज़रूरत है। कुरान खुद ही एक याद दिलाने वाली किताब है। ये बार बार हमें इस बात को याद दिलाती है कि इंसान मूल रूप से बुरा नहीं है बल्कि वो सिर्फ भूल का शिकार है। एक बार उनके धार्मिक, नैतिक और सामाजिक जीवन के मूल भाग में हमदर्दी बहाल कर दी गई तो वो सभी विवादैस्पद मुद्दे जो ईमान वालों के बीच विवाद पैदा करते हैं, उन्हें उचित परिपेक्ष्य में देखा जा सकता है।

ख्वाजा मुहम्मद जुबैर एक स्वतंत्र स्तंभकार हैं। ये लेख खलीज टाइम्स से लिया गया है।

स्रोत: http://www.nation.com.pk/pakistan-news-newspaper-daily-english-online/columns/21-Jul-2012/the-essence-of-fasting

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