Tuesday, August 30, 2011

आओ ईद मनाएं , सब मिलजुल कर !!

ईद एक इस्लामी त्यौहार है. ईद का यह दिन  रमज़ान के बाद आता है। 
ताज्जुब की बात इस बार यह हुई कि लखनऊ से लेकर भारत के दूसरे हिस्सों तक बहुत जगह चांद देखा गया लेकिन देवबंद में चांद नज़र नहीं आया जबकि आसमान साफ़ है। दूसरी जगहों से मिली ख़बर और गवाहियों की बुनियाद पर उलमा ए देवबंद ने भी ईद का ऐलान कर दिया है। ईदगाह समेत कई मस्जिदों में भी ईद की नमाज़ अदा की जाएगी।
मुसलमान भाई ईद की नमाज़ से पहले फ़ितरह ज़रूर निकाल दें और फ़ितरह की रक़म वे किसी को भी दे सकते हैं, चाहे वह मुस्लिम हो या मुस्लिम न हो, बस वह ग़रीब होना चाहिए। वह भी नए कपड़े पहनेगा और हमारी ही तरह वह भी ख़ुदा की नेमतों से लुत्फ़ उठाएगा। 
जो मुसलमान इस महीने में अपने माल से ज़कात निकालते हैं, वे भी हिसाब लगाकर ज़कात दे दें। इसके बाद फिर सदक़ा वग़ैरह अलग से है और यह भी ग़रीबों के लिए ही है।
मुसलमानों को ध्यान देना चाहिए कि उनका पैसा ग़रीबों के पास ही पहुंचे जो कि मदद के मुस्तहिक़ हैं, अल्लाह का हुक्म यही है और इसे पूरा करने के बाद भी मुसलमान को डरते रहना चाहिए कि उसके हुक्म को पूरा करने में कोई कमी तो नहीं रह गई है।
अल्लाह अपना हक़ माफ़ कर सकता है लेकिन बंदों का हक़ वह माफ़ नहीं करेगा, यह उसने बता दिया है।
ईद का मतलब यही है कि ख़ुद भी ख़ुशी मनाओ और दूसरों को भी ग़म के अंधेरों से निकालो, जितना भी हो सके।
इस्लाम का रास्ता यही है।
क़ुरआन का फ़रमान यही है।
दुनिया को इसी रास्ते की तलाश है।
आओ ईद मनाएं , सब मिलजुल कर !!

लोग इन्हें धर्म गुरू कहते हैं जबकि ये पक्के मतलब गुरू हैं.


घर को आग लगा रहे हैं घर के चराग़
अख़तर ख़ान साहब ने स्वामी अग्निवेश के बारे में किसी वकील साहब का क़ौल नक़ल करते हुए अपनी एक पोस्ट में लिखा है कि ‘वह आर्य समाज की जायदाद पर क़ब्ज़ा जमाए हुए हैं और सरकारी दलाल हैं।‘
लोग उनसे इसलिए भी ख़फ़ा हैं कि उन्होंने अन्ना से ग़द्दारी की.

स्वामी अग्निवेश जैसे बहुत से मौलवी और सूफ़ी मुसलमानों में भी हैं जो कांग्रेस से लेकर बीजेपी तक हरेक पार्टी के साथ हैं. इसका मतलब यह है कि उनमें से जिसका मतलब जिस पार्टी से पूरा हो रहा है, वह उसके साथ हैं.

लोग इन्हें धर्म गुरू कहते हैं जबकि ये पक्के मतलब गुरू हैं.
अपने मतलब के लिए ये अपनी क़ौम को बेच देते हैं.
जनता आपस में टकरा रही है और ये गुरू मौज मार रहे हैं.
किसी टकराव में इनमें से कोई भी नहीं मरता, यह सोचने वाली बात है.
ये इलेक्शन भी नहीं लड़ते तब भी रईसी शान से बसर करते हैं.
इसी तरह के लोग हरेक क़ौम में मिलेंगे, इनका क्या इलाज है ?

Monday, August 29, 2011

ब्लॉगर्स मीट वीकली 6 में एक शेर जो हमें पसंद आया


ब्लॉगर्स मीट वीकली 6 की ख़ास बात यह है कि इसमें बहुत आसान अल्फ़ाज़ में बता दिया है कि ज़िंदगी की हक़ीक़त असल में क्या है ?
इसी के साथ हिंदी ब्लॉगिंग गाइड के 31 मज़ामीन भी नज़्रे अवाम किए गए हैं.
अन्ना इस मीट में भी छाये रहे, अन्ना ने जितना बड़ा आंदोलन खड़ा किया और जिस तरह जनता ने उनका साथ दिया वह बेनज़ीर है लेकिन जाने हमें अब भी यही लगता है कि सरकार जनता के साथ फ़रेब से काम ले रही है.
पत्रकार भी झूठ का सहारा ले रहे हैं.
मीट में इस मौज़ू पर भी कई मज़ामीन हैं.
http://hbfint.blogspot.com/2011/08/6-eid-mubarak.html

एक शेर जो हमें पसंद आया वह यह है





फ़लक के चांद को मुश्किल में डाल रखा है
ये किसने खिड़की से चेहरा निकाल रखा है 

'बुनियाद' पर कुछ  उम्दा शेर

Sunday, August 28, 2011

‘अवतार तकनीक‘ : दुष्टों के विनाश के लिए Hindi Blogging Guide (31)


आम तौर से राजपूत, गूजर, जाट और पठान आदि जातियों के सदस्य इस तकनीक का अच्छा इस्तेमाल अनायास ही करते देखे गए हैं।
यह तकनीक एक बहुत भारी तकनीक है क्योंकि लड़ना असल काम नहीं है बल्कि यह असल बात है कि किस मक़सद के लिए लड़ा जा रहा है ?
अवतार की लड़ाई मात्र एक लड़ाई नहीं होती बल्कि वह सब लड़ाईयों का अंत करती है। 
अवतार कभी अपने आप नहीं लड़ता और न ही उसे लड़ने की कोई इच्छा होती है लेकिन दुखी और परेशान हाल सज्जन लोग उसके पास आते हैं और बताते हैं कि बुरे लोग किस किस तरह उन्हें टॉर्चर कर रहे हैं ?
किस तरह वे ईश्वर और धर्म का मज़ाक़ उड़ा रहे हैं ?
किस तरह वे नैतिकता की धज्जियां उड़ा रहे हैं ?

अवतार का मक़सद इन्हीं गुणों की रक्षा करना होता है। इन गुणों की रक्षा के लिए वह बुरे लोगों को उपदेश देता है लेकिन अगर बुरे लोगों को उपदेश से ही सुधरना होता तो उपदेश तो वे उससे पहले भी सुन रहे थे। वे उसका भी मज़ाक़ उड़ाते हैं। पापी लोग समझते हैं कि यह भी उपदेश देने के सिवा कुछ और नहीं कर पाएगा और ऐसा सोचकर वे उसे भी घेर लेते हैं और उससे भिड़ जाते हैं।
उपदेश को बेकार जाता देखकर और ख़ुद को घिरा देखकर अवतार के पास अब कोई और उपाय शेष ही कब रहता है ?
अब एक भयानक रण होता है जिसे हिंदी ब्लॉगिंग की दुनिया में महाभारत का नाम दिया जा सकता है। 
पापी वे होते हैं जो युद्ध के बाद लुंज पुंज और हताश-निराश से नज़र आएं जबकि युद्ध के बाद अवतार पहले से ज़्यादा तेजोमय और बलशाली होकर उभरता है।
एक नया ब्लॉगर भी इस ‘अवतार तकनीक‘ का इस्तेमाल कर सकता है लेकिन इसकी बुनियादी शर्तों में से यह है कि शुरूआत लड़ाई से न हो बल्कि उपदेश से हो और मसला बातचीत से सुलझ जाए तो फिर लड़ाई की कोई गुंजाइश ही नहीं है।

यहाँ देखें पूरी पोस्ट : http://hbfint.blogspot.com/2011/08/hindi-blogging-guide-31.html

Friday, August 26, 2011

दोस्तो ! आपकी जेब भर सकती है ‘हातिम ताई तकनीक‘

हातिम ताई तकनीक की यह सबसे बड़ी सफलता है कि इसे इस्तेमाल करने वाला खलनायक भी नायक जैसा ही सम्मान पाता है और मसीहा समझा जाता है।
एक नया ब्लॉगर भी इसे आसानी से आज़मा सकता है। 
जो इस तकनीक पर चलना चाहे तो उसे ख़ुद को लोगों के मददगार और मसीहा के रूप में पेश करना होगा। अगर आपके पास ठीक ठाक दौलत है तो आप हिंदी ब्लॉगर की रूपयों पैसों से मदद करने की बात भी अपनी पोस्ट और अपनी टिप्पणियों में कह सकते हैं। यह बात आपको बार बार दोहरानी चाहिए। यह बात इतनी ज़्यादा बार दोहरानी चाहिए कि आप नाम याद आते ही रूपये का ध्यान बेइख्तियार ही आ जाए।
ग़रीबों की मदद करने के लिए आप कोई ट्रस्ट भी बना लें वर्ना बेहतर तो यह है कि अपना ब्लॉग बनाने से पहले एक ट्रस्ट ज़रूर बना लें। जो लोग नाजायज़ तरीक़ों से कमा रहे हैं और अपने नाजायज़ रास्तों में ही ख़र्च कर रहे हैं, उनकी आत्मा पर बहुत बोझ हो जाता है। ऐसे में जब वे कुछ दान करते हैं तो उन्हें अपनी आत्मा पर से कुछ बोझ कम होता हुआ लगता है। अपनी आत्मा की शांति के लिए वे बार बार दान करते रहते हैं। दान करने से एक तरफ़ तो उन्हें शांति मिलती है और दूसरी तरफ़ उनकी शान भी टपकती रहती है। ऐसे लोगों का माल लूटने के लिए तो बहुत से लोग गुरू होने का ढोंग भी रचाए फिर रहे हैं लेकिन फिर भी ऐसे गुरू सभी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। ऐसे लोग आपके ट्रस्ट को चंदा भी देंगे।
अमीर लोगों की दिनचर्या बहुत बिज़ी होती है और ग़रीब का भी सारा दिन रोटी के जुगाड़ में ही निकल जाता है। दोनों ही बिज़ी हैं। अमीर के पास तो फिर भी संडे सैटरडे को या सुबह शाम को घूमने फिरने या क्लब में जाने का समय मिल जाता है लेकिन ग़रीब आदमी के पास तो इतना समय भी नहीं होता। ऐसे में ग़रीब आदमी किसी से मदद मांगने के लिए जाए भी तो किस दिन और किस समय ?
आपका ट्रस्ट ग़रीबों की यही समस्या हल करेगा। 
इसके लिए आप भी नियमित रूप से क्लब जाना शुरू कर दीजिए। आपको वहां कुछ काम न हो तो अपनी बेटी को ही उस क्लब का मेंबर बना दीजिए और आप उसके साथ जाने लगिए या फिर ख़ुद मेंबर बन जाइये और उसे साथ ले जाने लगिए। उसे रस्सी कूद कर पेट घटाने पर और लटक लटक कर क़द बढ़ाने पर लगा दीजिए और आप ख़ुद टेनिस खेलिए या फिर तीरंदाज़ी कीजिए। इससे आप बिल्कुल एक अमीर आदमी के माफ़िक लगेगा और अपने जैसे के पास ही आदमी उठता बैठता है। 
बस अमीर आदमी आपके पास आने जाने लगेंगे। बातचीत में आप बस यूं ही अपने ट्रस्ट का ज़िक्र कर दीजिएगा। दान देने के लिए उसकी आत्मा जब भी फड़फड़ाएगी , वह आपको ज़रूर याद करेगा। ट्रस्ट के वार्षिक समारोह में उसे चीफ़ गेस्ट बनाएंगे तो वह आपको दान हंड्रेड परसेंट देगा।
ग़र्ज़ यह कि इस तकनीक से आप किसी को देंगे बाद में और आपको मिलेगा पहले और वह भी दें तो दें और न दें तो न दें। 
एक रब के सिवा के और कौन देख रहा है ?
लड़की के रिश्ते की समस्या भी यही तकनीक दूर करेगी। लोग अच्छा ससुर उसे मानते हैं जो ज़्यादा दे और आप तो बैठे ही देने के लिए हैं। लड़की का रंग और क़द हल्का हो तो भी चल जाता है लेकिन बाप की जेब हल्की हो तो नहीं चलेगी।
इसलिए आज हरेक आदमी पर लाज़िम है कि वह अमीरी के दो चार उपकरण का जुगाड़ ज़रूर कर ले और एक लग्ज़री कार और एक कुत्ता इनमें सबसे ज़रूरी उपकरण हैं। ब्लड हाउंड, अलसेशियन और बुलडॉग कुत्तों का लुक ‘हातिम ताई तकनीक‘ के पात्र से मैच नहीं करता। सफ़ेद पॉमेरियन इस पात्र की सौम्यता से पूरी तरह मैच करता है।

पूरी पोस्ट में इसी तरह की बातें हैं , आप देखना चाहें तो जाइए इस लिंक पर -

आपकी जेब भर सकती है ‘हातिम ताई तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (30)

Thursday, August 25, 2011

अमर कुमार साहब की मौत की ख़बर से एक झटका लगा है


आज यह ईमेल मिली जो कि अमर कुमार साहब की मौत की ख़बर दे रही है
हम उन्हें ज़्यादा नहीं जानते क्योंकि हमारे ब्लॉग पर वे कभी आए नहीं और हमने उन्हे कभाी पढ़ा नहीं लेकिन फिर भी उनकी मौत से हमें भी एक झटका तो लगा ही है।
देखिए ईमेल -

[ब्लॉग की ख़बरें] दीजिये डा. अमर कुमार जी को अनूठी श्रद्धांजलि

DR. ANWER JAMAL via blogger.bounces.google.com to me
show details 8:22 AM (1 hour ago)
डॉ.अमर कुमार एक बहुविध अध्ययनशील ,प्रखर मेधा के धनी ब्लॉगर थे -साथ ही जिजीविषा ऐसी की अपनी बीमारी के बाद भी बिना इसका अहसास लोगों को दिलाये वे लगातार लोगों के चिट्ठों को ध्यान से पढ़ते और सारगर्भित टिप्पणियाँ करते ...
डा. साहब अक्सर टिप्पणी पर मॉडरेशन लगाए जाने के विरोधी थे।
इसके खि़लाफ़ वह अक्सर ही आवाज़ बुलंद किया करते थे।
उनकी ख़ुशी के लिए कम से कम एक दिन सभी लोग अपने ब्लॉग से मॉडरेशन हटा लें तो उनके लिए हमारी तरफ़ से यह एक सम्मान होगा।
वह एक ज्ञानी आदमी थे।
उनकी टिप्पणी उनके ज्ञान का प्रमाण है।
जिसे आप देख सकते हैं इस लिंक पर  

वसुधा एक है और सारी धरती के लोग एक ही परिवार है Holy family

 डा० अमर कुमार said...
लँगूर = इँसानी फ़ितरत का एक चालाक ज़ानवरमस्जिद की मीनारें = एक फ़िरके के तरफ़दार
मंदिर के कंगूरे = दूसरे तबके की दरोदीवार

यह मुआ लँगूर सदियों से दोनों बिल्लियों को लड़वा कर अपनी रोटी सेंक रहा है !
अनवर साहब मुआफ़ी अता की जाये तो एक सीधा सवाल आपसे है, अल्लाह के हुक्म की तामील में कितने मुस्लमीन भाई ज़ेहाद अल अक़बर को अख़्तियार कर पाते हैं और इसके दूसरी ज़ानिब क्यों इन भाईयों को ज़ेहाद अल असग़र का रास्ता आसान लगता है ? वज़ह साफ़ है, अरबी आयतों के रटे रटाये मायनों में दीन की सही शक्लो सूरत का अक्स नहीं उतरता ।
यही बात शायद हम पर भी लागू होता हो, चँद सतरें सँसकीरत की, जिन्हें हम मँत्र कहते कहते इँसानी के तक़ाज़ों से मुँह फेर लेते हैं, यह क्या है ? यह चँद चालाक हाफ़िज़-मुल्लाओं औए शास्त्री-पँडितों की रोज़ी है, लेकिन बतौर आम शहरी अगर हम इन्हें समझ कर भी नासमझ बने रहने में अपने को महफ़ूज़ पाते हैं , हद है !

ज़ेहाद का क़ुरान में मतलब है- बुराइयों से दूर रहने के लिए मज़हब को अख़्तियार करना ...और इसके दो तरीके बताए गए हैं। एक तो तस्लीमातों का रास्ता-ज़ेहाद अल अक़बर ....इसका मतलब है आदमी अपनी बुराइयों को दूर करें....दूसरा है ज़ेहाद अल असग़र... अपने दीन की हिफ़ाज़त के लिए भिड़ना.... अगरचे इस्लाम पर ईमान लाने में कोई अड़चन लाये,...किसी मुस्लिम बिरादरान पर कोई किस्म का हमला हो, मुसलमानों से नाइँसाफ़ी हो रही हो, ऐसी हालत में इस तरह के हथियारबन्द ज़ेहाद छेड़ने की बात है, मगर अब इसका मिज़ाज़ ओ मतलब ही बदल गया है...ज़ेहन में ज़ेहाद का नाम आते ही सियासी मँसूबों की बू आती है, यही वज़ह है कि ज़ेहाद के नाम को दुनिया में बदनामियाँ मिलती आयीं हैं ।
हम लड़ भिड़ कर एक दूसरे की तादाद भले कम कर लें, एक दूसरे के यक़ीदे को फ़तह नहीं कर सकते.. तो फिर क्या ज़रूरत है.. एक दूसरे की चहारदिवारी में झाँकने की ?


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Posted By DR. ANWER JAMAL to ब्लॉग की ख़बरें at 8/24/2011 07:52:00 PM

Tuesday, August 23, 2011

जो लोग विवाहित होते हैं उनकी औसत उम्र भी ज्यादा होती है.


खुशी का खजाना है दाम्पत्य जीवन

अध्ययन का केंद्र बिंदु यही है कि वैवाहिक संबंध स्त्री और पुरूष दोनों के लिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई सारे लाभ लाता है. और जब ये संबंध किसी वजह से नहीं रहता तो विपरीत असर दिखाने लगता है. शोध केवल शादीशुदा लोगों पर ही नहीं किया गया, बल्कि उन लोगों की मानसिक स्थिति पर भी किया गया जिनकी शादी नहीं हुई, जो कभी शादी नहीं करना चाहते या जिनकी शादी टूट चुकी है.

दाम्पत्य जीवन का अपना एक वैज्ञानिक पहलू होता है. विज्ञान के लिहाज से दाम्पत्य जीवन करामाती होता है. वैवाहिक जीवन लोगों की चिंताएं और परेशानियां दूर कर देता है, लेकिन तब जब दाम्पत्य जीवन जीया जाए.

एक अध्ययन में ये बात सामने आई है.वैवाहिक जीवन तनाव, अवसाद और चिंता से मुक्तिदिलाता है. और अगर किसी वजह से शादी टूट जाए, तलाक से, अलग होने से या एक साथी की मृत्यु से तो शरीर की सकारात्मक ऊर्जाएं बिखरने लगती हैं.

किसी को हमेशा जीवन में कोई ऐसा व्यक्तिचाहिए होता है- स्त्री को पुरुष, पुरुष को स्त्री. जिससे अपने मन की बात खुल कर कहा जा सके. अगर मन में निरंतर कोई चिंता, कोई अवसाद घिरा रहेगा तो उसका शरीर पर लगातार बुरा असर पड़ता है.

यह अगर किसी से बांट लिया जाए तो तय है की जो कष्ट है जो न सिर्फ मानसिक बल्कि शारीरिक भी है, क्योंकि ये पूरी एक जैव रासायनिक प्रक्रिया है जिसका शरीर पर बुरा असर पड़ता है. इस शोध में यह भी देखा गया है की शादीशुदा जिंदगी में अवसाद का असर औरत और मर्द पर अलग-अलग तरह से होता है.

यानी पुरूष, स्त्रियों से कम अवसादग्रस्त होते हैं. माना जाता है कि औरतों को कुछ मनोविकार अधिक होते हैं तो पुरूषों को भी कुछ मनोविकार अधिक होते हैं.

इसके जैव रासायनिक कारण हैं. जो हमें अच्छी अनुभूति देते हैं जिन्दगी में. उसमें उतार-चढ़ाव अधिक हों तो वह स्त्री हो या पुरुष दोनों में ही उसका असर दिखता है.

स्त्रियों में यह ज्यादातर होता है क्योंकि उनकी प्रजनन क्षमता में जो उतार-चढ़ाव उनके सेक्स हारमोंस में होते हैं, वे शरीर में परिलक्षित होते हैं.

शादीशुदा जिंदगी औरतों में ‘सब्सटेंस यूज डिसऑर्डर’ के खतरे को भी कम कर देती है. यह वो समस्या है जब कोई व्यक्तिअकेलेपन से निजात पाने के लिए नशे जैसी चीजों का सहारा लेता है.

वैवाहिक संबंध स्त्री और पुरूष दोनों के लिए मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई सारे लाभ लाता है. और जब ये संबंध किसी वजह से नहीं रहता तो विपरीत असर दिखाने लगता है.

परिणाम यही निकलता है कि शादीशुदा लोग जीवन में यादा खुशहाल रहतें हैं. पाया गया है कि जो लोग विवाहित होते हैं उनकी औसत उम्र भी ज्यादा होती है.

मानसिक स्वास्थ्य के लिहाज से विवाह पुरूषों के लिए स्त्रियों के बनिस्बत  ज्यादा फायदेमंद है. स्कॉट के मुताबिक इसका फायदा दोतरफा है. वैवाहिक जीवन का प्रेम एक ऐसी दवा है जो लगातार आपके खून और और आपके दिलो-दिमाग में सक्रिय रहती है. रिश्ते की मजबूती इस दवा का खजाना भरती रहती है.
असल माखज़ - 
http://manishmalhotra.jagranjunction.com/2011/04/23/%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%A4%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%B9%E0%A4%A4-jagran-junction-forum/

आब ए ज़म ज़म की ख़ूबियां


आज आब ए ज़म ज़म की एक और ही विशेषता के बारे में जानने का मौक़ा हमें तब मिला जबकि हम देखने के लिए तो गए तो कुछ और मिल गई यह पोस्ट ,
आप भी देखें और इसे अपने मुसलमान दोस्तो को इसकी जानकारी दें।

करिश्माई है आब ए जमजम



Monday, August 22, 2011

ब्लॉगर्स मीट वीकली का मरकज़ी ख़याल इस बार क्या था ?

क्या आप जानना चाहेंगे ?
ब्लॉगर्स मीट वीकली में हिंदी ब्लॉग जगत से चुने हुए लोग पहुंचे और आयोजन भी सफल रहा। इस बार जन्माष्टमी की बधाई और शुभकामनाएं ही नज़र आईं।
प्यार मुहब्बत और सुख चैन का माहौल तैयार होते देखकर हमें तो अच्छा लगा और आपको भी लगेगा।

ब्लॉगर्स मीट वीकली का मरकज़ी ख़याल इस बार क्या था ?


क्या आप जानना चाहेंगे ?
ब्लॉगर्स मीट वीकली में हिंदी ब्लॉग जगत से चुने हुए लोग पहुंचे और आयोजन भी सफल रहा। इस बार जन्माष्टमी की बधाई और शुभकामनाएं ही नज़र आईं।
प्यार मुहब्बत और सुख चैन का माहौल तैयार होते देखकर हमें तो अच्छा लगा और आपको भी लगेगा।
जाना होगा इस पोस्ट पर

Sunday, August 21, 2011

कौन पकड़ता है टिप्पणियों को भी कबूतरों की तरह ?


यह काम करता है एक डिज़ायनर ब्लॉगर और एक महिला ब्लॉगर इस हुनर की अच्छी माहिर बताई जाती है। कौन बता रहा है ?
अरे भाई और कौन बता सकता है ?
जो हिंदी ब्लॉगिंग गाइड लिख रहा है वही बता रहा है यह नायाब तरकीब।
आप चूहों की तरह टिप्पणियों के फंसने का इंतेज़ार छोड़िए और कबूतर की तरह पकड़ना सीखिए ,

कबूतर की तरह भी पकड़ी जाती हैं टिप्पणियां Hindi Blogging Guide (28)


Saturday, August 20, 2011

पूरा सच जानना चाहें तो देखिये 'कट्टरता और प्रतिबद्धता में अंतर' Kattar


सिद्धांतों के लिए प्रतिबद्धता को लोग कट्टरता का नाम दे देते हैं।
कट्टरता घातक होती है, इसमें आदमी नया सीखने की और निष्पक्ष होकर सामयिक ज़रूरतों के मुताबिक़ सही फ़ैसला करने की क्षमता खो देता है जबकि अविचल भाव से अच्छे उसूलों के लिए त्याग करना प्रतिबद्धता कहलाता है।

हमें आज कल्याणकारी सत्य के लिए प्रतिबद्ध समाज के निर्माण की घोर आवश्यकता है। ऐसा समाज जिसमें कट्टरता के लिए कोई गुंजाइश न हो।

पूरा सच जानना चाहें तो देखिये :

नेकी को इल्ज़ाम न दो

Friday, August 19, 2011

देखिये एक डिज़ायनर पोस्ट , डिज़ायनर ब्लॉगिंग में रामबाण है ‘हनी बी तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (27)

‘हनी बी तकनीक‘ अर्थात मधुमक्खी तकनीक एक सफल तकनीक है जो सदा काम करती है और आपके ब्लॉग तक पाठक खींच लाती है और न सिर्फ़ बहुत से पाठक खींच लाती है बल्कि उन पाठकों को टिप्पणी करने के लिए मजबूर भी करती है।
डिज़ायनर पोस्ट 
ब्लॉगवाणी के जिस ब्लॉग को मैंने सबसे पहले फ़ोलो किया वह डाक्टर टीकाराम जी का था और मुझे आज भी याद है कि मैंने चिठ्ठाजगत पर सबसे पहले जिस ब्लॉग के शीर्षक पर क्लिक किया वह ब्लॉग मिस कंचन का था। उसके बाद मैंने कितने ही ब्लॉग पढ़े और उनसे बहुत कुछ सीखा और गर्व होता है कि हमारे बीच अमीर लाल जी, कबीर लाल जी , नयनसुख जी और मुन्नीबाई जी जैसे हिंदी के सशक्त हस्ताक्षर मौजूद हैं। मुझे भाई अरबाज़ हुसैन की पुस्तक के विमोचन कार्यक्रम में इन सभी के साथ रू ब रू मिलने का इत्तेफ़ाक़ भी हुआ और वे पल जीवन के अविस्मरणीय पल बन चुके हैं।
मुझे याद है कि जब मुझे इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बुलाया गया तो ठीक उसी दिन हमारा कुत्ता टॉमी बीमार हो गया। जिसका इलाज फ़ॉरेन रिटर्न डाक्टर टेकचंद गोयल जी से कराया जाना बहुत ज़रूरी था। इसका मतलब यह था कि अपनी पज़ेरो तो टॉमी के लिए बुक हो गई और बेटा अपनी स्पोर्ट मोटर साइकिल हमें देगा नहीं। मन मारकर हमें सूमो पर ही समझौता करना पड़ा। हमारी श्रीमति जी ने हमें बहुत शर्म दिलाने की कोशिश की कि हम अपना कार्यक्रम रद्द करके उनके साथ टॉमी को लेकर डाक्टर के पास चलें लेकिन हमें तो उनकी हर बात बस एक ऐसा उपदेश लग रही थी जिसे पूरा करना हमारे बस में नहीं था और सही भी है। इस बात को एक मशहूर लतीफ़े में इस तरह बयान किया गया है

एक दोस्त - यार ग़ज़ल और उपदेश में क्या अंतर है ?
दूसरा दोस्त - शादी से पहले महबूबा की हर बात ग़ज़ल लगती है और शादी के बाद पत्नी की हर बात उपदेश लगने लगती है
पूरी तकनीक और पूरा फ़ायदा पता चलेगा डा. अनवर जमाल साहब के साझा ब्लॉग पर

डिज़ायनर ब्लॉगिंग में रामबाण है ‘हनी बी तकनीक‘ Hindi Blogging Guide (27)

Thursday, August 18, 2011

आडवाणी जी को बुढ़ापे में क्या ज़रूरत थी किसी विदेशी औरत के कंबल में घुसने की ?


अब हो गई न जेल !
नारी चाहे देसी हो या विदशी, हरेक की एक इज़्ज़त होती है और भारतीय लोग नारी का सम्मान सबसे ज़्यादा करते हैं। रमेश आडवाणी ने भारत की परंपरा भुला दी और पहुंच गए जेल , देखिए

अश्लील खेल ले गया जेल, रमेश आडवाणी को Under The Blanket


Wednesday, August 17, 2011

...क्योकि उनका ध्यान इबादत मे कम दिखावे मे ज़्यादा रहता है

रमजान का महीना बङी बरकतो का और नेमतो का है इस महीने मे हमारी नेकियो का अज्र बढा दिया जाता है गुनाह माफ किये जाते है। जिन्दगी गुजारने का खूबसूरत तरीका क्या होना चाहिए इसका भी हमे इसी माह में पता चलता है। रोजा रखने का मतलब सिर्फ भूखा प्यासा रहना नही है, रोजा दीन का एक अहम सतून है और दीन का मतलब है जिन्दगी गुजारने का तरीक़ा रोजा हर आक़िल बालिग़ मुसलमान पर फ़र्ज़ है। जो कोई भी शख़्स बिना किसी वजह के और बिना किसी मजबूरी के रोजा छोङ दे वो गुनाहगार है। रोज़ा सिर्फ खाना पीना छोङना नही बल्कि ज़ुबान को ग़लत और बुरी बातो से रोकना, जैसे ग़ीबत करना (चुग़ल ख़ोरी) गाली गलौच, झूठ से बचना, अपनी आंखो की हिफ़ाज़त, अपने हाथो को लङाई झगङा और ग़लत रास्ते पर चलने से रोकना और अपने दिल से बुराई निकालना रोज़े का ही एक हिस्सा है। क़ुरान-ए-करीम और दूसरी आसमानी किताबे भी रमज़ान के महीने मे ही हम बन्दो को अता की गई। रमदान के महीने मे शुक्र गुज़ार बन्दो और रोज़ेदारो के लिए जन्नत के दरवाज़े खोल दिये जाते है। रोज़ा हमे बुराइयो से रोकता है इस महीने मे रोज़ा रखने से सब्र करने बरदाश्त करने की तालीम मिलती है। नमाज़ों की पाबंदी होती है हर वक़्त खाने पीने, ठूस ठूस कर खाने की आदत ख़त्म हो जाती है। हदीस है, (जिसका मफहूम है) कि जिस शख़्स ने ईमान व सवाब की नीयत से रजाए-ए-इलाही के लिए रोज़ा रखा, तो इसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिये जाते है। रमज़ान का महीना ख़ुदा की ख़ास इनायत और रहमतो का महीना है, इसका ख़ास अहतमाम करना चाहिए, अगर किसी मजबूरी की वजह से रोज़ा न रख सके तो सबके सामने खाते पीते मत फिरो। क़ुरान की तिलावत और तरावीह का ख़ास ख़्याल रखा जाए। सदक़ा ख़ैरात करें ग़रीबो यतीमो और मजबूरो की मदद करें, यह जरूरत मन्दो के साथ हमदर्दी का महीना है, फितरा ज़कात (जो सिर्फ इस्लाम ने ही दुनियां की भलाई के लिए अमीरो और मालदारों पर गरीबों की मदद के लिए टैक्स की तरह लगाया है) हिसाब करके पाई पाई अदा करें। अपने माल से पैसे से मदद करें अपने मिज़ाज मे नरमी लाएं, जिस आदमी ने रोज़ा रखकर भी झूठ बोलना नही छोड़ा तो उसका रोज़ा बेकार गया, रोज़े का मक़सद ही ज़िन्दगी को साफ़ सुथरा बनाना है। रोज़े का मतलब कम खाना कम सोना और ज्यादा से ज्यादा इबादत करना है। कुछ लोग जो रमज़ान के रोज़ों से ज़्यादा ईद की ख़रीदारी मे लग जाते है, इन रहमतो बरकतो से दूर हो जाते है क्योकि उनका ध्यान इबादत मे कम दिखावे मे ज़्यादा रहता है, जबकि असल ईद उसकी है जिसने इबादत की और बुरे कामौ से बचा रहा और अपने ख़ुदा को मना लिया। तो दुनियांवी एतबार से ये बरकतो का महीना अल्लाह की तरफ से इबादतों और क़बूलियत का सीज़न है और सीज़न के मौक़े पर भारी छूट का लाभ उठाएं और अपने अल्लाह को मना लें, ताकि हम सब पर अल्लाह रहम करे।
असल माखज़ :- http://www.oppositionnews.com/hindi/hindi/news_detail.php?gid=16&nid=772

Tuesday, August 16, 2011

हैवान को सज़ा सलट वॉक की ज़रूरत ख़त्म कर देती है ?


सलट वॉक की ज़रूरत  इसलिए पड़ रही है क्योंकि पशुबल संपन्न आदमी जब औरत को अपना शिकार बना लेता है तो उसे इंसाफ़ के बजाय ज़िल्लत मिलती है। अगर मज़लूम औरत को इंसाफ़ मिल जाए और हैवान को सज़ा तो आज दुनिया में कहीं भी सलट वॉक निकालने की ज़रूरत ही न होती ।
...लेकिन यह दुनिया भी कैसी है कि ख़ुद तो सज़ा देना नहीं चाहते और जब कोई  हैवान को सज़ा देने की कोशिश करता है तो उसकी आलोचना करते हैं।
इसी मौज़ू को लेकर हमने कुछ तहरीर किया है , इस पर आपकी राय चाहिए

आंख के बदले आंख का इंसाफ ??? ( एक रिपोर्ट जिसे सुना भी जा सकता है )

मुल्ला नसरूद्दीन का पूरा क़िस्सा

मध्यपूर्व के मुस्लिम देशों में 13वीं शताब्दी में हुए मुल्ला नसरुद्दीन, अपने समय का सर्वाधिक बुद्धिमान और खुशमिज़ाज व्यक्ति था। तरह-तरह की तिकड़मबाजियों से वह धन जमा करता और उसे गरीबों, जरूरतमंदों में बांट देता। इसलिए समाज के गरीब और बेसहारा लोगों के बीच वह काफी लोकप्रिय था। उसकी लोकप्रियता से बादशाह और सरदार उससे चिढ़ते थे। वे उसे सदा सजा देने की ताक में रहते, पर हर बार अपनी चालाकियों से वह बच निकलता है।
पूरा किस्सा यहाँ मिलेगा : 

Monday, August 15, 2011

इन आयतों से हमने क्या सीखा ?

 सूरए बक़रह की १८६वीं आयत का अनुवाद है :-
 और जब भी मेरे बंदे मेरे बारे में तुमसे पूछें तो (हे पैग़म्बर) कह दो कि मैं समीप (ही) हूं। जब भी कोई पुकारने वाला मुझे पुकारता है तो मैं उसकी पुकार सुनता हूं। अतः उन्हें भी मेरा निमंत्रण स्वीकार करना चाहिए और मुझपर ईमान लाना चाहिए ताकि उन्हें मार्गदर्शन प्राप्त हो जाए।
एक व्यक्ति ने पैग़म्बरे इस्लाम (स) से पूछा कि ईश्वर हमसे सीमप है कि हम धीमे स्वर में उससे प्रार्थना करें या हमसे दूर है कि हम उसे तेज़ आवाज़ में पुकारें। ईश्वर की ओर से यह आयत उतरी कि ईश्वर, बंदों के समीप है। वह अपने बंदों से इतना समीप है कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। जैसाकि सूरए क़ाफ़ की १६वीं आयत में कहा गया है कि हम मनुष्य से उसकी गर्दन की रग से भी अधिक समीप हैं।
प्रार्थना के लिए कोई विशेष समय नहीं है। मनुष्य जब भी और जिस अवस्था में चाहे ईश्वर को पुकार सकता है परन्तु रमज़ान का महीना चूंकि प्रार्थना और प्रायश्चित का महीना है अतः प्रार्थना की यह आयत रमज़ान और रोज़े की आयतों के बीच में आई है।
इस छोटी सी आयत में ईश्वर ने सात बार अपने पवित्र अस्तित्व और सात बार अपने बंदों की ओर संकेत किया है ताकि अपने और अपने बंदों के बीच के अति निकट रिश्ते और संबन्ध को दर्शा सके।
आइए अब देखते हैं कि इन आयतों से हमने क्या सीखा ?
ईमान की एक निशानी रोज़ा रखना है। रोज़ा मनुष्य में पापों से बचने की भावना उत्पन्न और उसे सुदृढ़ करता है।
ईश्वरीय आदेशों का पालन स्वयं हमारे लिए आवश्यक है न ये कि ईश्वर को हमारी नमाज़ या रोज़ों की आवश्यकता है।
इस्लाम एक व्यापक धर्म है। उसने प्रत्येक व्यक्ति की क्षमता और स्थिति के अनुसार उचित क़ानून प्रस्तुत किये हैं। जैसाकि रमज़ान में यात्री, रोगी और वृद्ध का आदेश अन्य लोगों से भिन्न है।
रमज़ान के महीने में रोज़ा रखकर हमें अपनी आत्मा को पाप से पवित्र कर लेना चाहिए तथा अपने हृदय में क़ुरआन के प्रभाव की भूमि प्रशस्त करनी चाहिए।
ईश्वर हमारी प्रार्थना और पुकार को सुनता है तथा हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है अतः हमें भी उससे प्रार्थना करनी चाहिए और केवल उसी के आदेशों का पालन करना चाहिए क्योंकि हमारा मोक्ष व कल्याण उसपर ईमान रखने में ही निहित है।

ब्लॉगर्स मीट वीकली 4 में एक कमी जो हमें महसूस हुई !!! 'स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं'


एक कमी का अहसास हुआ इस बार मीट में और उसकी तरफ़ ध्यान दिलाते हुए हमने अपनी टिप्पणी में कहा भी है कि -
# ब्लॉगर्स मीट वीकली एक अच्छा आयोजन है। जितने लिंक्स इसमें शामिल हैं उतने आज तक हमने एक जगह कहीं नहीं देखे हैं। यह बेमिसाल है। 

# इसके सद्र रूपचंद साहब और इसमें सहयोग देने वाले सभी भाई बहन का जज़्बा क़ाबिले क़द्र है। आपकी मेहनत हल्के हल्के रंग ला रही है लेकिन आजाद यौमे आज़ादी है इस मौक़े पर आपको कोई नज़्म वग़ैरह पोस्ट में भी देनी चाहिए थी जिससे पढ़ने वालों के दिलों में आज़ादी का वलवला जाग उठे।

# हमारे लिंक्स शामिल करने के लिए शुक्रिया !

यह भी हमारा ख़याल भर है हालांकि वहां आज़ादी पर लिखे गए बहुत से साहित्य के लिंक्स मौजूद हैं लेकिन जो बात हमें खटकी हमने कह दी।
जय हिंद !
यह पोस्ट हमें सबसे ज़्यादा मुफ़ीद मालूम हुई -

टिप्पणी में लिंक बनाना सीखिए Hindi Blogging Guide (24)

Sunday, August 14, 2011

आंख के बदले आंख का इंसाफ ??? ( एक रिपोर्ट जिसे सुना भी जा सकता है )


क्या आंख के बदले आंख का इंसाफ जायज है.. आप कहेंगे नहीं... लेकिन अगर कोई आपकी आंख में तेजाब डाल कर आपको जिंदगी भर के लिए अपाहिज कर दे तो...

 
चौबीस साल की आमने बहरामी ईरान में इंजीनियरिंग पढ़ती थी. बेहद ज़हीन और बला की खूबसूरतउसी के साथ पढ़ने वाला माजिद मोहाविदी उसके पीछे पड़ गयाउससे शादी की जिद करने लगाबहरामी को माजिद में कोई दिलचस्पी नहीं थीउसने एक बार और बार बार मना कियाएक लड़की का इनकार माजिद की फर्जी मर्दानगी को भेद गया और उसने बाल्टी भर तेजाब आमने के जिस्म पर उंडेल दिया. एक रिपोर्ट जिसे सुना भी जा सकता है 
इस ख़बर को आप सुन भी सकते हैं इस लिंक पर :

क्या यह चमत्कार नहीं है ?


आजकल आधुनिक दिखने के लिए चमत्कार का इन्कार करना ज़रूरी हो गया है .
फ़र्ज़ी बाबा हाथ की सफ़ाई दिखाकर लोगों को ठगते हैं तो उनकी पोल खोलनी चाहिए न कि चमत्कार का ही इन्कार करना चाहिए.
चमत्कार क्या है ?
जिस काम को इंसान ख़ुद कर न सके और अपनी अक्ल से उसे समझ न सके कि यह काम हुआ कैसे ?
उसे चमत्कार माना जाता है .
ऐसे बहुत से काम आज भी होते रहते हैं.
भयंकर सुनामी हादसे में जहां पूरी बस्ती तबाह हो गई वहां मस्जिद का सुरक्षित रह जाना एक चमत्कार ही है , जिसे हरेक आदमी अपनी आंखों से देख सकता है.

Tsunami mosques


http://www.youtube.com/watch?feature=player_embedded&v=wa7Lqxzm9NE

ये चमत्कार बताते हैं कि सब कुछ इंसान की अक्ल में नहीं समा सकता.
इंसान की अक्ल और ताक़त महदूद और सीमित है जबकि इस कायनात में जो घटनाएं हो रही हैं उन सबको समझने के लिए लामहदूद और असीमित अक्ल और ताक़त की ज़रूरत है.
ऐसा इंसान के लिए इस दुनिया में संभव नहीं है .
इस्लाम यही बताता है .

कौन है जो इस हक़ीक़त को झुठला सके ?

यह इस्लाम का सबसे बड़ा चमत्कार है कि दलील की बुनियाद पर कोई इसे झुठला नहीं सकता .
अल्लाह ने हमें ऐसी दौलत बख्शी है.
हम मुसलमानों को इसकी क़द्र करनी चाहिए और अल्लाह के हुक्म पर अमल करना चाहिए .
चमत्कार का मक़सद भी यही होता है कि लोगों को अल्लाह के वुजूद का यक़ीन हासिल हो जाए .
अगर आदमी ग़ौर करे तो उसे यह यक़ीन हासिल हो सकता है .

Saturday, August 13, 2011

अपनी बेटी के ये दो अधनंगे फ़ोटो ...

आखि़र कोई बाप ऐसा लापरवाह कैसे हो सकता है ?
रचना जी का ऐतराज़ वाजिब है . देखिये लिंक -
http://mypoeticresponse.blogspot.com/2011/08/blog-post_9052.html

ऐसे लोग हमारे चारों तरफ़ हैं जो कि दूसरे लोगों को बताते रहते हैं ग़लत क्या है ?
और ख़ुद उसी ग़लत पर चलते रहते हैं .
दूसरों की बेपर्दा लड़कियों को तकते हैं और उनके बदन के एक एक अंग का नाप ऐसे लेडीज़ टेलर की तरह निगाहों से ही ले लेते हैं।
...लेकिन अपनी बहन-बेटियों को अपने ही जैसी गंदी निगाहों से बचाने के लिए हिजाब ज़रूरी नहीं मानते।
दरअसल इन लोगों के पास कोई साफ़ गाइडेंस ही नहीं है कि औरत अपने शरीर का कितना भाग ढके और क्यों ढके ?
इसीलिए वे मन की मर्ज़ी कुछ भी पहन रहे हैं .
...लेकिन दुख की बात तो यह है कि आज मुसलमान भी इसी रास्ते पर है.
मुसलमान के पास तो साफ़ हिदायत मौजूद है ,
फिर वह गुमराही के रास्ते पर क्यों गामज़न है ?
हमें अपनी फ़िक्र करनी चाहिए .
...क्योंकि आखि़रत में अल्लाह हमसे दूसरों के नहीं बल्कि हमारे आमाल के बारे में सवाल करेगा और नाफ़रमानी का अंजाम आग का गड्ढा होगा .

देख लीजिये - सूरए यूनुस – चौथा रूकू

तुम फ़रमाओ कि अल्लाह हक़ की राह दिखाता है, तो क्या जो हक़ की राह दिखाए उसके हुक्म पर चलना चाहिये या उसके जो ख़ुद ही राह न पाए जब तक राह न दिखाया जाए (13)
तो तुम्हें क्या हुआ कैसा हुक्म लगाते हो {35} और(14)
उनमें अक्सर तो नहीं चलते मगर गुमान पर (15)
बेशक गुमान हक़ का कुछ काम नहीं देता, बेशक अल्लाह उनके कामों को जानता है {36}

ऐ मुसलमानों , इस्लाम को पूरा इख्तियार करो ताकि सुधार मुकम्मल हो .

लड़कियों को जिंदा दफ़्न कर देना अरबों में आम था . आज वहां इस रस्म का नामलेवा एक भी नहीं हैं जबकि भारत में लड़कियों को मार डालने का चलन अभी खत्म नहीं हुआ है और अगर खत्म हुआ भी है सिर्फ मुसलमानों से . भारत के मुसलमानों ने अपनी ज़िंदगी के जितने हिस्से में इस्लाम को ले लिया है उतना हिस्सा सुधर गया है, बाक़ी में फ़िसाद आज भी है।
ऐ मुसलमानों , इस्लाम को पूरा इख्तियार करो ताकि सुधार मुकम्मल हो।
कुछ बातों पर सबसे पहले ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि इनका ताल्लुक़ समाज की शांति से और लोगों के हुक़ूक़ से है।

1. लड़कियों को जीवित गाड़ देने और उन्हे मार डालने से रोकना।[5]
2. हर प्रकार के अश्लील और बुरे कार्यों से मुक़ाबला।[6]
3. क़त्ल और लोगों के माल को लूटना और बिना कारण के रक्तपात करने का मुक़ाबला।[7]
4. औरतों के बारे में ग़लत विश्वासों और विचारों से मुक़ाबला।[8]

पूरा मज़्मून यहां देखा जा सकता है 
इस्लाम की महान शिक्षा के कुछ नमूने 

Friday, August 12, 2011

अनामिका बहन जी ने यह सवाल किया है
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हमारा कहना है कि
बहन जी ! आपको राखी के पर्व की शुभ कामनाएं .
राखी का त्यौहार एक अच्छा त्यौहार है . अगर हिदू धर्म से कोई अच्छी चीज़ जोड़ी जा रही है तो इसमें क्या हरज है ?
हिन्दू ज्योतिषी  ही इसका मुहूर्त निकालते हैं और हिन्दू देवी देवताओं की पूजा के बाद ही इसकी रस्में अदा की जाती हैं . ऐसे में इसे हिन्दू धर्म से कोई और नहीं जोड़ता बल्कि खुद हिन्दू ही जोड़ देते हैं . 

क्या आप सूअर की चर्बी खा रहे हैं ?

बी. एस. पाबला  जी का लेख देख कर मन में यही विचार आया, क्योंकि हम तो लेज़ खाते नहीं हैं और हो सकता है कि दूसरे प्रोडक्ट्स में E 631 हम भी खा रहे हों जो कि हक़ीक़त में सूअर की चर्बी का कोड है .
यूरोप और अमेरिका में जा बसे हिन्दू मुसलमान कहाँ तक बच पाते होंगे सूअर की चर्बी से .
मुस्लिम देशों में इसे गाय या भेड़ की चर्बी कह प्रचारित किया गया लेकिन इसके हलाल न होने से असंतोष थमा नहीं और इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नींद उड़ गई। आखिर उनका 75 प्रतिशत कमाई मारी जा रही थी इन बातों से। हार कर एक राह निकाली गई। अब गुप्त संकेतो वाली भाषा का उपयोग करने की सोची गई जिसे केवल संबंधित विभाग ही जानें कि यह क्या है! आम उपभोक्ता अनजान रह सब हजम करता रहे। तब जनम हुआ E कोड का
तब से यह E631 पदार्थ कई चीजों में उपयोग किया जाने लगा जिसमे मुख्य हैं टूथपेस्ट, शेविंग क्रीम, च्युंग गम, चॉकलेट, मिठाई, बिस्कुट, कोर्न फ्लैक्स, टॉफी, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थ आदि। सूची में और भी नाम हो सकते हैं। हाँ, कुछ मल्टी-विटामिन की गोलियों में भी यह पदार्थ होता है। शिशुयों, किशोरों सहित अस्थमा और गठिया के रोगियों को इस E631 पदार्थ मिश्रित सामग्री को उपयोग नहीं करने की सलाह है लेकिन कम्पनियाँ कहती हैं कि इसकी कम मात्रा होने से कुछ नहीं होता।
पिछले वर्ष खुशदीप सहगल जी ने एक पोस्ट में बताया था कि कुरकुरे में प्लास्टिक होने की खबर है चाहें तो एक दो टुकड़ों को जला कर देख लें। मैंने वैसा किया और पिघलते टपकते कुरकुरे को देख हैरान हो गया। अब लग रहा कि कहीं वह चर्बी का प्रभाव तो नहीं था!?
अब बताया तो यही जा रहा है कि जहां भी किसी पदार्थ पर लिखा दिखे
E100, E110, E120, E 140, E141, E153, E210, E213, E214, E216, E234, E252,E270, E280, E325, E326, E327, E334, E335, E336, E337, E422, E430, E431, E432, E433, E434, E435, E436, E440, E470, E471, E472, E473, E474, E475,E476, E477, E478, E481, E482, E483, E491, E492, E493, E494, E495, E542,E570, E572, E631, E635, E904
समझ लीजिए कि उसमे सूअर की चर्बी है।
और कुछ जानना हो कि किस कोड वाल़े पदार्थ का उपयोग करने से किसे बचना चाहिए तो यह सूची देख लें
कैसी रही?
पूरा मज़मून यहाँ है - http://www.haaram.com/CompleteArticle.aspx?aid=312929&ln=hi

सभी हिन्दू बहनों को ख़ास मुबारकबाद !

muslim raksha bandhan गूगल सर्च किया तो बहुत अच्छी अच्छी फोटो देखने को मिली जिससे हिन्दू मुस्लिम एकता के दर्शन हुए ।

हमारी तरफ़ से भी सभी हिन्दू बहनों को ख़ास मुबारकबाद!

वे सुरक्षित रहें हर बला से !
यही हमारी दुआ है ख़ुदा से !!

किस मुहूर्त में बांधे रक्षा सूत्र ? Raksha Bandhan 2011

मैं भ्रष्टाचारी … कोई मेरा भी दर्द सुनो

जब मैंने सुना कि बाबा रामदेव रिटायर अफसरों को बुला रहे हैं ,तब मुझे लगा कि अब मेरे दिन फिर लौटने वाले हैं ,..लेकिन अब पता चला, उनको ईमानदार लोग चाहिए ,..मैं ठहरा पक्का भ्रष्टाचारी ,..मुझे तो खाने के तरीके ईजाद करने के अलावा कुछ आता ही नहीं ,..लेकिन भाई लोगों मैं एक रहस्य जरूर सबको बताना चाहता हूँ ,..भ्रष्टाचारी बहुत तकलीफ में हैं ,..सबसे बड़ा दर्द यह है कि , हम अपनी तकलीफ किसी को बता भी नहीं सकते..सेवाकाल में तो हरगिज नहीं …अब मैं भ्रष्टाचारी का दर्द अपनी कहानी के माध्यम से सबको बताऊँगा ,…शायद बाबा और अन्ना को हमारी बिरादरी पर रहम आ ही जाये

मैं नकदी लाल पुत्र श्री उधारी लाल ( पूर्व बाढ़ राहत अधिकारी )..आज स्वीकार करता हूँ कि मैंने अपने सेवाकाल में करोड़ों का माल बनाया ,..कई घोटाले किये ..जनता की पूड़ी सब्जी खायी …… जानवरों,फसलों का मुआवजा तो छोड़िये ,..मरे बन्दों को भी हजम कर गया ,..नाव ,..स्टीमर ,..दवा-दारू ,.टेंट, मिटटी,पत्थर ऐसी कोई चीज नहीं जिसको मैंने हजम ना किया हो ,.. अब क्या -क्या बताएं ,… एक बार तो खुद के डूबने का भी पैसा भी खा चूका हूँ ...

Thursday, August 11, 2011

कहानी जो दिल में उतर जाए ...

लोगों को नेकी की राह पर चलने की तालीम देने के लिए ही मुस्लिम बुज़ुर्गों और वलियों ने क़ुरआनी उसूलों को कहानी के अंदाज़ में भी बयान किया है।
इसे आप देख सकते हैं मौलाना जलालुद्दीन रूमी जैसे बुलंद आलिमों की किताबों में . जो जैसे समझना चाहे समझ सकता है .
नेट ने आज बहुत सी बातों को समझना और इख्तियार करना आसान कर दिया है। जबकि पहले बहुत सी मुश्किलें थीं.

ईंट की दीवार / जलालुद्दीन रूमी


महीना पाक है रमज़ान का और लोग हैं कि ...


ऐसे ऐसे काम कर रहे हैं जिन्हें देखकर इंसान का सिर झुक जाए। कहां मर गई है इंसानियत ?
मौज-मज़े के चक्कर में पड़कर इंसान मौत को भुला बैठा है। वह भूल गया है कि उसे अपने अमल के बारे में ख़ुदा को जवाब भी देना है। जिस बात को आदमी अपनी नज़र के सामने नहीं रखता उन्हें वह भूल जाता है। रमज़ान का महीना क़ुरआन पढ़ने के लिए ख़ास है। पांच वक्त की नमाज़ के अलावा तरावीह की नमाज़ और तहज्जुद का अहतमाम भी इसीलिए है।
नेट पर भी आज क़ुरआन को हासिल करना आसान है।
जो मुसलमान नेट से जुड़े हैं उनके लिए एक लिंक है, जहां से क़ुरआन कई भाषाओं में मुफ़त पढ़ा जा सकता है। आप भी इसे देखिए और ज़्यादा से ज़्यादा मुसलमानों तक इसे पहुंचायें ताकि सभी लोग अपनी बुरी आदतों से तौबा करके नेक राह पर चलें।
आमीन .

Wednesday, August 10, 2011

आखि़री प्यार बनाम पहला प्यार उर्फ़ धोखे की दास्तान


प्यार तो प्यार है क्या पहला और क्या आखि़री लेकिन ऐसा नहीं होता। प्यार की गिनती भी की जाती है और पति अपनी पत्नि को शान से बताता है कि उससे पहले वह कितनी लड़कियों को फ़्लर्ट कर चुका है या शादी से पहले उस पर कितनी लड़कियां मरती थीं। जबकि औरत अपने पति से इसके ठीक उल्टा कहती है। वह कहती है कि उसके अलावा तो उसके मन मंदिर में कोई आया ही नहीं, कभी कोई समाया ही नहीं। अगर यह सच है तो फिर देस भर के मर्द किन लड़कियों से फ़्लर्ट करते रहे ?
वे भी तो किसी की पत्नियां बनी होंगी और उसे बता यही बता रही होंगी कि मेरा पहला प्यार तो आप ही हैं ?
पता नहीं कौन किसे धोखा दे रहा है ?
औरतें मर्दों को या फिर मर्द औरतों को ?
या दोनों ख़ुद ही धोखा खा रहे हैं ?

बहुत सी लड़कियों को लाइन मार चुकने के बाद मर्द नई लड़की को अपने झांसे में लेने के लिए कहता है कि ‘तुम पर आकर तो बस मेरी सारी तलाश और सारी जुस्तजू ही ख़त्म हो गई है। तुम मेरा आखि़री प्यार हो।‘

औरत और मर्द की सोच में कितना अंतर है ?

हिंदी क्या भारत की राष्ट्र भाषा है?


हिंदी क्या भारत की राष्ट्र भाषा है?

            आज भारत की सबसे बड़ी समस्या में से एक है , उसके राष्ट्र भाषा की पहचान क्या है ? जी हाँ , शायद आपको यह जान कर ताज्जुब होगा, की दुनिया के सबसे बड़े  गणतंत्र भारत की संवैधानिक रूप से कोई भी राष्ट्र भाषा नहीं है । आज के परिवेश में हिंदी अपने ही देश में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है ।  आज भी हिंदी एक राजभाषा है । पर सवाल ये है की अपने ही राष्ट्र में हिंदी इतनी मजबूर क्यूं है ।  अगर गहराई से सोचे तो इसके पीछे मूल कारण हमारी अपनी प्रांतीय, सामुदायिक लड़ाई है । आंध्र अपनी भाषा को वरीयता देता है , पंजाब के लोग पंजाबी चाहते है , बंगाल के लोग बंगाली को वरीयता देते हैं ।  
                  पर असल में हम अपने कुंठित विरासत को बचने हेतु अपनी वास्तविक विरासत ''अनेकता में एकता" को ही नष्ट कर रहे है।  हिंदी को ये तो स्वीकार कर लिया जाता है की ये दो भाषाओं के मध्य संपर्क सूत्र का काम करती है , जैसे एक स्थल पर बंगाली और पंजाबी मिलते है तो आपस में भाषा प्रवाह की समस्या उत्पन्न हो जाती है , ऐसे में दो विभिन्न भाषियों के मध्य हिंदी  तथा अंग्रेजी ही एक ऐसी भाषा बचती है जो इन्हें आपस में जोड़ सकती है ।                          परन्तु अंग्रेजी एक विदेशी भाषा होने के नाते बहुत कम दुरी तक सिमीत  है  अतः हिंदी ही एक स्वदेशी भाषा के रूप में बचती है जो आम जनमानस को आपस में जोड़ दे । 
सारांशतः यदि हिंदी राष्ट्रीय संपर्क भाषा के रूप में स्थापित है तो सैधांतिक  रूप से भी राष्ट्र भाषा का दर्जा हिंदी को ही मिलनी चाहिए ।   
-शेखर तिवारी
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यह लेख हमें ईमेल से मिला था .
सही है या गलत यह आप हमें बताएं .

Tuesday, August 9, 2011

दिव्या जी के द्वारा कुछ कमेँट्स का जवाब न देना विरक्ति नहीं कहलाएगा।

आज हमने दिव्या जी की नई पोस्ट पढ़ी और उस पर टिप्पणी करनी चाही तो टिप्पणी का ऑप्शन बंद था. सो यहाँ अपनी पोस्ट में कमेंट कर देते हैं ।
'दिव्या जी , ग़लत नीयत से टिप्पणी करने वालों को आपके द्वारा जवाब न देना परिपक्वता कहलाएगा, विरक्ति नहीं ।'

इस तरह हमने आज की सक्रियता का कोटा पूरा कर लिया है ।

दिव्या जी का शुक्रिया सही सलाह के लिए


ब्लॉगर्स मीट वीकली 3  के बारे में हमें कुछ पसोपेश था . हमने सलाह मांगी . ज़्यादातर ने तो सुनी और अनसुनी कर दी लेकिन दिव्या जी और सुनील कुमार जी ने ध्यान दिया और सही सलाह दी . हमने उनकी सलाह पर अमल किया और सहरी के वक्त यानि लगभग 4 बजे रात को पहला कमेंट देकर अपनी हाज़िरी भी दर्ज करा दी है. डा. अनवर जमाल साहब ने बताया कि लगभग 500 पेज व्यूज़ हो गए हैं और यह पोस्ट ब्लॉग की लोकप्रिय पोस्ट बन गई है पहले दिन ही .
सदर साहिब ने , जनाब रूपचंद शास्त्री साहिब ने भी अपने सदारती ख़ुत्बे में अच्छी बातें कही हैं .

दिव्या जी की केवल सलाह ही उम्दा नहीं थी बल्कि उनके ख़ुद आने से भी हिंदी ब्लॉग जगत में हैरानी महसूस की जा रही है और ऐसा वह अक्सर करती हैं . उनका आना भी एक मिसाल बन गया है . जहां इतने खुले दिल के लोग मौजूद हों वहां से जुड़े रहना सचमुच एक ख़ुशी की बात है .

थैंक्स दिव्या जी ...

अच्छी राह बताने के लिए
मंच पर साथ आने के लिए

'ब्लॉगर्स मीट वीकली 3' वाले दिन पेज व्यूज़ 496

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इसके टाइम फौरमैट में कुछ कमी है शायद इसे प्रकाशित किया तो यह कल ८ तारीख में  ६:१८ PM पर प्रकाशित हो गयी है . अब इसे पुन: प्रकाशित करता हूँ .

Monday, August 8, 2011

दिव्या जी का शुक्रिया सही सलाह के लिए


ब्लॉगर्स मीट वीकली 3  के बारे में हमें कुछ पसोपेश था . हमने सलाह मांगी . ज़्यादातर ने तो सुनी और अनसुनी कर दी लेकिन दिव्या जी और सुनील कुमार जी ने ध्यान दिया और सही सलाह दी . हमने उनकी सलाह पर अमल किया और सहरी के वक्त यानि लगभग 4 बजे रात को पहला कमेंट देकर अपनी हाज़िरी भी दर्ज करा दी है. डा. अनवर जमाल साहब ने बताया कि लगभग 500 पेज व्यूज़ हो गए हैं और यह पोस्ट ब्लॉग की लोकप्रिय पोस्ट बन गई है पहले दिन ही .
सदर साहिब ने , जनाब रूपचंद शास्त्री साहिब ने भी अपने सदारती ख़ुत्बे में अच्छी बातें कही हैं .



डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...







हिन्दी ब्लॉगर्स फोरम इंटरनेशनल पर आयोजित ब्लॉगर्स मीट वीकली (3) में मैं आप सभी पाठकों का इस्तकबाल करता हूँ!
सबसे पहले तो इस ब्लॉगर मीट को सजाने सँवारने वाले DR. ANWER JAMAL साहिब का शुक्रिया करता हूँ कि उन्होंने मुझ नाच़ीज़ को इस काबिल समझा कि मैं इसकी सदारत कर सकूँ। जबकि मैं खुद को इसके काबिल समझने में सर्वथा अयोग्य पाता हूँ! मगर इनका प्यार भरा आग्रह मैं ठुकरा न सका! क्योंकि इनके आग्रह में बहुत बल था!
बहन प्रेरणा अर्गल का भी इस ब्लॉग को सँवारने में बहुत बड़ा योगदान है। मैं उनका भी शुक्रगुज़ार हूँ!
मित्रों!
आप जो पोस्टों का गुलदस्ता यहाँ पर देख रहे हैं। इसके पीछे इस ब्लॉग व्यवस्थापक की मेहनत स्पष्ट ही झलक रही है। न जाने इस शख़्श ने इसको सजाने-सँवारने में अपनी कितनी रातों की नींद कुर्बान होगी! तब कहीं जाकर इस खुश्बूदार सुमनों के पुष्पगुच्छ की महक हमारे सामने बहार बनकर आई है।
नये पुराने सभी ब्लॉगरों की पोस्टों की चर्चा बहुत सलीके से आज की ब्लॉगर मीट में की गई है!
मुझे आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि अपके ब्लॉगों की यहाँ पर चर्चा होने से आपके ब्लॉगों पर लोगों की आवाजाही निश्चित रूप से बढ़ेगी!
शुभकामनाओं के साथ-
आपका
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
------

दिव्या जी की केवल सलाह ही उम्दा नहीं थी बल्कि उनके ख़ुद आने से भी हिंदी ब्लॉग जगत में हैरानी महसूस की जा रही है और ऐसा वह अक्सर करती हैं . उनका आना भी एक मिसाल बन गया है . जहां इतने खुले दिल के लोग मौजूद हों वहां से जुड़े रहना सचमुच एक ख़ुशी की बात है .

थैंक्स दिव्या जी ...

अच्छी राह बताने के लिए
मंच पर साथ आने के लिए

'ब्लॉगर्स मीट वीकली 3' वाले दिन पेज व्यूज़ 496


लिंक आ गया है ब्लॉगर्स मीट के लिए


ब्लॉगर्स मीट वीकली (3) Happy Friendship Day



हमेशा की तरह इस बार भी हमारे पास लिंक आ गया है ब्लॉगर्स मीट वीकली का . हम भी मन बना चुके हैं कि इसमें शामिल होना ही है और हफ़्ते में एक बार आधा घंटा निकाल कर सभी के ब्लॉग झांक लेने में कुछ बुरा भी नहीं है। हमें उम्मीद भले की ही रखनी चाहिए और कोशिश भी भली ही करनी चाहिए .
फ़ासले मिटा दो और क़रीब आ जाओ .
हम तो यही मक़सद समझे इस ब्लॉगर मिलन समारोह का .
रमज़ान का महीना है और सहरी का वक्त है लिहाज़ा आराम से पोस्ट भी बन गई है और अब सो जाएंगे हम .
शब-बख़ैर !

Sunday, August 7, 2011

रचना जी का चुभता हुआ सवाल और हमारा जवाब

हमें डाक्टर अनवर जमाल साहब ने आवाज़ दी कि आओ ब्लॉगर्स मीट वीकली में .
हालांकि फ़ैसला पूरी तरह हमारे हाथ में था लेकिन कुछ आशंकाएं हमारे मन में थीं। इसीलिए हमने बहुत दिनों बाद एक पोस्ट तैयार की।

इस पोस्ट में हमें कुछ सुझाव मिले और रचना जी की तरफ़ से एक ऐतराज़ भी।
डा. दिव्या जी , सुनील कुमार जी और डा. अनवर जमाल साहब की तरफ़ से मिले हुए सुझावों के मद्दे नज़र यह पाया कि हिंदी ब्लॉगिंग से जुड़े रहना ही ठीक है और अपनी मसरूफ़ियत और वक्त की कमी के पेशे नज़र यह ठीक है कि लिखा कम जाए और पढ़ा ज़्यादा जाए. इसका तरीक़ा यह है कि जो लिंक हमें ब्लॉगर्स भेजते रहते हैं हम उन्हीं को यहां पोस्ट की शक्ल दे दिया करें। इस तरह हमारी सक्रियता भी बनी रहेगी और पुराने लेखों को नए पाठक भी मिलेंगे और हम भी जिन लिंक्स को टाल गए हैं उन्हें अब देख लेंगे .

रचना जी की तरफ़ से एक चुभता हुआ सवाल भी मिला और उनका सवाल बिल्कुल वाजिब है। उन्होंने कहा कि

हिंदी ब्लॉगर्स को जोड़ पाने


is judane sae hotaa kyaa haen is par vimarsh nahin hotaa


kis samajik muddae ko laekar hindi blog samaaj ne kahii apni pehchaan banaii haen

 
रचना जी ! मिलकर क्या होता है ?
न मिलने से मिलना तो बहरहाल बेहतर ही होता है .
आपकी बात सही है कि हिंदी ब्लॉग जगत अभी तक राष्ट्रीय स्तर पर किसी मुद्दे को मज़बूती से न उठा पाया और आपकी ही तरह हमारे मन में भी ऊहापोह बनी हुई थी . इस कमी को भी मिलजुलकर एक मन और एक राय होकर ही दूर किया जा सकता है न कि एक दूसरे को इल्ज़ाम देकर .

आपके हरेक सही काम में हम आपके साथ हैं।
अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता . यह बात हमेशा से ही मशहूर है और बिल्कुल सही है .

इसी बीच उम्मीद जगाती हुई अख़तर ख़ान अकेला साहब की पोस्ट हमारे सामने आई है और हमारे मन से ऊहापोह पूरी तरह ख़त्म हो गई :    

शुक्र है खुदा का आज सपना मेरा पूरा हुआ ,,खुदा बुरी नज़र से बचाए इस सद्भाव की ब्लोगिंग को


हम भले ही कुछ न कर सकें लेकिन प्यार के दो बोल तो बोल ही सकते हैं।
आज मित्रता दिवस है। इस अवसर पर पढें यह पोस्ट

याराना यार का .......

लीजिये ham हो गए  सक्रिय 

Saturday, August 6, 2011

क्या ब्लॉगर्स मीट वीकली सचमुच हिंदी ब्लॉगर्स को जोड़ पाने में कामयाब रहेगी ?

हिंदी ब्लॉगिंग का रूप पिछले कुछ अर्से से काफ़ी बदल गया है। कुछ नए लोग आ गए हैं और कुछ पुराने चले गए हैं। हम ख़ुद भी जीती जागती सच्ची दुनिया में लोगों के दुख-दर्द दूर करने में जुट गए थे और यहां आना ऐसा लगता था जैसे कि देना ज़्यादा और पाना कम।
इंसान के पास वक्त सबसे क़ीमती सरमाया है।
ब्लॉगिंग में वक्त बहुत लगता है।
हम हट गए और हमारे साथियों में से भी कुछ फ़ेसबुक वग़ैरह की तरफ़ मुड़ गए लेकिन हमारे एक साथी डा. अनवर जमाल साहब ब्लॉगर डॉट कॉम पर ही डटे और अपने ब्लॉग बढ़ाते रहे।
अब ‘ब्लॉगर्स मीट वीकली‘ के लिए हमें बार-बार ईमेल करके बुलाया कि आप भी ‘हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल‘ के सदस्य हो। इसलिए मीट में आओ और सक्रियता दिखलाओ।
एक दो टिप्पणी तक तो ठीक है लेकिन सक्रियता दिखाने का मतलब ?
बहुत लंबे अर्से बाद एक पोस्ट लिख रहा हूं और चाहता हूं कि आपसे सुझाव और मार्गदर्शन मांगू कि क्या हिंदी ब्लॉगिंग में वापसी करना ठीक रहेगा ?
क्या ब्लॉगर्स मीट वीकली सचमुच हिंदी ब्लॉगर्स को जोड़ पाने में कामयाब रहेगी ?
यदि आपका जवाब हां हो तो फिर इसमें वक्त लगाने का कुछ फ़ायदा है वर्ना तो सूखे तिलों को निचोड़ने से फ़ायदा क्या है ?
देखिए ब्लॉगर्स मीट वीकली की पहली नशिस्त
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/1-virrtual-step-to-be-unite.html
और
ब्लॉगर्स मीट वीकली की दूसरी नशिस्त
http://hbfint.blogspot.com/2011/08/2-love-for-all.html

क्या ब्लॉगर्स मीट वीकली सचमुच हिंदी ब्लॉगर्स को जोड़ पाने में कामयाब रहेगी ?

हिंदी ब्लॉगिंग का रूप पिछले कुछ अर्से से काफ़ी बदल गया है। कुछ नए लोग आ गए हैं और कुछ पुराने चले गए हैं। हम ख़ुद भी जीती जागती सच्ची दुनिया में लोगों के दुख-दर्द दूर करने में जुट गए थे और यहां आना ऐसा लगता था जैसे कि देना ज़्यादा और पाना कम।
इंसान के पास वक्त सबसे क़ीमती सरमाया है।
ब्लॉगिंग में वक्त बहुत लगता है।
हम हट गए और हमारे साथियों में से भी कुछ फ़ेसबुक वग़ैरह की तरफ़ मुड़ गए लेकिन हमारे एक साथी डा. अनवर जमाल साहब ब्लॉगर डॉट कॉम पर ही डटे और अपने ब्लॉग बढ़ाते रहे।
अब ‘ब्लॉगर्स मीट वीकली‘ के लिए हमें बार-बार ईमेल करके बुलाया कि आप भी ‘हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम इंटरनेशनल‘ के सदस्य हो। इसलिए मीट में आओ और सक्रियता दिखलाओ।
एक दो टिप्पणी तक तो ठीक है लेकिन सक्रियता दिखाने का मतलब ?
बहुत लंबे अर्से बाद एक पोस्ट लिख रहा हूं और चाहता हूं कि आपसे सुझाव और मार्गदर्शन मांगू कि क्या हिंदी ब्लॉगिंग में वापसी करना ठीक रहेगा ?
क्या ब्लॉगर्स मीट वीकली सचमुच हिंदी ब्लॉगर्स को जोड़ पाने में कामयाब रहेगी ?
यदि आपका जवाब हां हो तो फिर इसमें वक्त लगाने का कुछ फ़ायदा है वर्ना तो सूखे तिलों को निचोड़ने से फ़ायदा क्या है ?
देखिए ब्लॉगर्स मीट वीकली की पहली नशिस्त
http://hbfint.blogspot.com/2011/07/1-virrtual-step-to-be-unite.html
और
ब्लॉगर्स मीट वीकली की दूसरी नशिस्त
http://hbfint.blogspot.com/2011/08/2-love-for-all.html

मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद एके-47 केस

मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद के एके-47 केस में कोई समानता नहीं है लेकिन हाल ही के लिए गए निर्णयों में जहां मुजफ्फरनगर भीषण दंगो के केस वापस ल...