Saturday, October 29, 2011

हमारी वाणी को नफ़रत फैलाने वाली ऐसी पोस्ट को प्रकाशित नहीं करना चाहिए

ZEAL: 'लाश' खाने के शौक़ीन हैं आप ?
कायस्थों में मांसाहार प्रचलित है, कुछ नहीं भी खाते होंगे जैसे कि डा. दिव्या नहीं खातीं लेकिन उन्होंने मांसाहारियों को राक्षस और दरिंदा घोषित कर दिया और इस सिलसिले में उन्होंने राष्ट्रभक्तों तक को नहीं बख्शा।
संसद भवन के रेस्टोरेंट में गोरक्षकों को भी मांसाहार करते देखा जा सकता है।
उन्होंने बक़र ईद पर कुरबानी की भी निंदा कर डाली।
हमारी वाणी का दावा है वह किसी भी धर्म की निंदा वाली पोस्ट प्रकाशित नहीं करेगी लेकिन उसने डा. दिव्या की पोस्ट को प्रकाशित किया और उसे सादर अपनी हॉट लिस्ट में जगह भी दी।
यह ग़लत बात है।
जो लोग खुद न घर के हैं और न घाट के हैं, मोटा माल कमाने के लालच में विदेश भागे हुए ये खुदग़र्ज़ लोग अब लोगों को बता रहे हैं कि मांसाहार करने वाले वाले दरिंदे और राक्षस हैं।
उनका यह कथन निंदनीय है।
हमारी वाणी को नफ़रत फैलाने वाली ऐसी पोस्ट को प्रकाशित नहीं करना चाहिए।

जो हमारे देशभक्तों को राक्षस और दरिंदा कहे, वह कहीं खुद ही ग़ददार या दिमाग़ी दिवालिया तो नहीं है ?


यह सच है कि हैदर अली, टीपू सुल्तान, बहादुर शाह ज़फ़र, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, मौलाना आज़ाद, सरहदी गांधी खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार ख़ान और कर्नल शाहनवाज़ जैसे बहुत से लोगों ने आज़ादी की लड़ाई लड़ी और ये सब मांसाहारी थे। आज़ादी की हिफ़ाज़त की ख़ातिर आज भी हमारे जो जांबांज़ लोग सरहदों पर
खड़े हैं, उनमें भी अधिकतर मांसाहारी ही हैं। 
देशवासियों में भी अधिकतर लोग मांसाहारी हैं और समुद्र किनारे जितने भी प्रदेश हैं, उनके निवासियों का मुख्य भोजन भी मछली आदि जलीय जीव हैं।
जो कोई मांसाहारियों को राक्षस और दरिंदा कहता है, वह वतन के शहीदों और रखवालों को और अधिकतर भारतीयों को राक्षस और दरिंदा कहता है और ऐसे आदमी के ग़ददार होने में कुछ शक नहीं है या फिर वह जाहिल और पागल है।
ऐसा कुछ नहीं है तो फिर मनोरोगी तो वह है ही।
इस विषय पर पूरी संतुष्टि देता हुआ एक ब्लॉग :

Monday, October 24, 2011

क्या आत्महत्या करके मरने वाले लोगों की जान की कोई क़ीमत ही नहीं है ?


हिन्दी ब्लोगर्स फ़ोरम इंटरनेश्नल  पर जमा किए गए लिंक्स हमेशा दिलो दिमाग़ को कुछ सोचने पर मजबूर कर देते हैं।
आत्महत्या करके मरने वाले लोगों की तादाद उनसे ज़्यादा है जो कि विदेशी आतंकवादियों का निशाना बनकर मरते हैं।
इसके बावजूद इन पर न तो कोई ध्यान देता है और न ही इन्हें बचाने के लिए कोई योजना ही बनाई जाती है।
क्या इनकी जान की कोई क़ीमत ही नहीं है ?
देखिये -

Saturday, October 22, 2011

अपने समाज के अच्छे लोगों को परेशान मत करो


किरण बेदी जी बिज़नेस क्लास का टिकट लेकर इकॉनॉमी क्लास में सफ़र कर रही हैं तो इससे देश की अर्थव्यवस्था पर क्या बुरा असर पड़ा ?
अगर वह कुछ रक़म बचा कर इसे ज़रूरतमंदों को दे रही हैं तो यह एक तारीफ़ के लायक़ बात है।
भ्रष्टाचार के खि़लाफ़ आवाज़ उठाने वालों को इतना मत सताओ कि इस देश में कोई भी सही बात के लिए आवाज़ उठाना ही छोड़ दे।
छोटी छोटी बातों को तूल वे लोग दे रहे हैं जो देश का माल हड़प किये बैठे हैं।
इनकी चालबाज़ी से सावधान रहना चाहिए।
अन्ना के मददगारों को तोड़ने की साज़िश के तहत यह सब हो रहा है।

Thursday, October 13, 2011

नैतिक समाज का निर्माण बाजार नहीं कर सकता


ऐसे ही घूमते हुए 'गोपाल सिंह चैहान' के लेख पर नज़र पड़ गयी ,
आप भी देखिये और बताइए कि कैसा है यह लेख ?
http://www.commutiny.in/mediafeatures/media

मीडिया साक्षरता: एक नई उम्मीद

इस देश के बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि आज के दौर में हम सभी 'नॉलेज सोसायटी' का हिस्सा हैं, जिसमें ज्ञान के एक बड़े हिस्से को समाज के सभी वर्गों तक पंहुचाने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मीडिया के कंधे पर है। लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में भी मीडिया से इस तरह के योगदान की अपेक्षा पहले भी थी और आज भी है। किसी भी नैतिक समाज के निर्माण के लिए यह जरूरी है कि उसका आधार एक सही ज्ञान की जड़ों से जुड़ा हो। यूनेस्को की एक रिपोर्ट "The World Ahead: Our Future in the Making", में यह साफ रेखांकित किया गया है कि किसी भी नैतिक समाज का निर्माण बाजार नहीं कर सकता।
यह अलग बात है कि यदि आज हम पहले से अधिक एक असमान समाज की सच्चाई में जी रहे हैं तो इसकी जिम्मेदारी बाजार के अलावा मीडिया के ऊपर भी है। उदारीकरण की प्रेरणा से भारत में पिछले कुछ सालों से उपजी 'सूचना क्रांति' की सबसे सफल संतान 'मीडिया' ने सभी ज्ञान परंपराओं को पछाड़ते हुए समाज की शिक्षा की दिशाओं को एक नये ढर्रे में मोड़ दिया। समाचार, दृश्य और विश्लेषण की त्रिआयामी जकड़ आज हर आदमी को यह जानने के लिए मजबूर कर रही है कि देश और विश्व में इस समय क्या चल रहा है। घटनाएं व्यक्तियों से ज्यादा महत्वपूर्ण लगने लगी हैं। धीरे-धीरे पैसे की बेशुमार आवक से इसमें फैशन, ब्यूटी, अपराध, हत्याएं इस कदर शामिल होती गयीं जहां से सच्चाई और नैतिकता का विचार ही एक अपराध बोध की तरह लगता है। उसने ज्ञान का हिस्सा बनने से कहीं ज्यादा बाजार का हिस्सा बनना पसंद किया। यही कारण है कि आज स्कूली या अन्य औपचारिक, अनौपचारिक शिक्षा माध्यमों से जुड़े चितंक, लेखक, विश्लेषक या नीति निर्देशक 'मीडिया साक्षरता' को पाठ्यक्रम का आवश्यक अंग मानने लगे हैं। वो इस बात पर जोर दे रहे हैं कि इस देश में पढ़ने वाले छात्र यह समझें कि समाज और संस्कृति की चेतना में मीडिया आज क्या भूमिका निभा रहा है।
'मीडिया साक्षरता' इस देश के लिए एक नयी अवधारणा है। लेकिन विश्व के कई हिस्सों में विशेषकर विकसित राष्ट्रों में बहुत सालों से इसको लेकर प्रयोग किये जा रहे हैं। भारत में 'मीडिया साक्षरता' पर कितना काम हुआ है और इसके क्या परिणाम दिखाई दे रहे हैं, अभी इस पर कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह जरूर देखा जा सकता है कि एनसीईआरटी (राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद) के अलावा अन्य संस्थाओं, स्कूलों के अलावा बड़ी संख्या में अध्यापकों और शिक्षा-शोध से जुड़े लोग इसको लेकर काफी गंभीर हैं।

Monday, October 10, 2011

शेखचिल्ली का बाप कौन है भाई ?

ताऊ रामपुरिया की तरह ही कोई साहब शेखचिल्ली का बाप बने हुए घूम रहे हैं ब्लॉग संसार में .
उन पर हमारी नज़र पड़ी ब्लॉगर्स मीट वीकली में, वहां हम अभी गए थे टिपण्णी करने तो देखा कि वह भी कुछ कह रहे हैं .
खैर , हमने कहा कि :-
@ प्रेरणा जी , यह सच है कि आपका लिंक्स को पसंद करना और उन्हें पेश करना दोनों ही काम निहायत सलीक़े का निशान हैं .
यह मंच ऐसे ही ऊंचाईयां छुए, यही दुआ है.
दिलों को जोड़ने की यह मुहिम बहुत मुबारक है और रूपचंद शास्त्री जी और अनवर जमाल साहब की मेहनत भी काबिल ए तारीफ़ है,

शुक्रिया .
October 10, 2011 8:21 PM 

ब्लॉगर्स मीट वीकली (12) Tajmahal

Posted on
  • Monday, October 10, 2011

  • by
  • DR. ANWER JAMAL

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  • Saturday, October 8, 2011

    लोग आलोचनात्मक टिप्पणियों को पचा नहीं पाते

    यह बात सही है 
     लोग आलोचनात्मक टिप्पणियों को पचा नहीं पाते है अक्सर उन्हें या तो प्रकाशित नहीं किया जाता या फिर हटा दिया जाता है | कई बार तो लोग आलोचनात्मक टिप्पणी करने वाले को ही भला बुरा कहने लगते है | किंतु क्या कभी किसी ने इस बात पर भी ध्यान दिया है की आलोचना है किस बला का नाम क्योंकि यहाँ तो यदि कोई आप की बात से असहमत हो जाये या आप की विचारों के विपरीत विचार रख दे,  जो उसके अपने है तो लोग उसे भी अपनी आलोचना के तौर पर देखने लगते है , जबकि वास्तव में कई बार ऐसा नहीं होता है है कि दूसरा ब्लॉगर आप को कोई टिप्पणी दे रहा है जो आप के विचारों से मेल नहीं खा रहा है तो वो आप की आलोचना ही करना चाह रहा है | कई बार इसका कारण ये होता है की वो बस उस विषय में अपने विचार रख रहा है जो संभव है की आप के सोच से मेल न खाता हो , कई बार सिक्के का दूसरा पहलू भी दिखाने का प्रयास किया जाता है | 
    शुक्रिया मैंगो पीपुल 
    http://mangopeople-anshu.blogspot.com/2011/10/mangopeople_07.html

    मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद एके-47 केस

    मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद के एके-47 केस में कोई समानता नहीं है लेकिन हाल ही के लिए गए निर्णयों में जहां मुजफ्फरनगर भीषण दंगो के केस वापस ल...