Sunday, April 19, 2015

ग्रीन टी पीजिए और बीमारी दूर भगाइए


हरी चाय(green tea) के फायदा
दांतों की रक्षा में सहायक: ग्रीन टी मसूड़ों में मौजूद नुक्सानदायक बैक्टीरिया को नष्ट कर दांतों की रक्षा करती है। इसमें मौजूद फ्लोरीन दांतों में खोड़ों (कैविटीज) के बनने को रोकता है।

गठिया से बचाव : जो लोग चार या पांच कप ग्रीन टी का सेवन करते हैं वे रूमेटाइड आर्थराइटिस पर नियंत्रण कर सकते हैं।
रोग प्रतिरोधक( immunity) क्षमता बढ़ाने में मदद: कुछ लोगों में स्टैमिना की कमी होती है, ग्रीन टी में मौजूद गुराना उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में सहायक होता है।
गुर्दे के इंफेक्शन  से सुरक्षा ग्रीन नियमित सेवन से गुर्दों के संक्रमण की संभावना कम होती है।

मस्तिष्क बीमारियों से लडने में सहायता ग्रीन टी में विभिन्न किस्म के पोषक तत्व पाए जाते हैं जो मल्टीपल स्कलीरोसिस जैसी दिमागी बीमारियों से लडने में सहायक होते हैं। ये दिमाग की कार्यप्रणाली को भी बढ़ाते हैं।
पाचन और भूख में : ग्रीन टी के सेवन से पाचन क्रिया बेहतर और तेज गति से काम करती है और यह भूख भी बढ़ाती है।

कैंसर से रक्षा में : माना जाता है कि ग्रीन टी में कुछ ऐसे पोषक तत्व होते हैं जो कैंसर कोशिकाओं को शरीर में प्रवेश करने से रोकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जो लोग कैंसर से जूझ रहे हैं वे ग्रीन टी के लगातार सेवन से इस बीमारी को रोकने में सक्षम हो सकते हैं। ग्रीन टी में एपीगैलोकैटेचिन गैलेट नामक एक एंटी-आक्सीडैंट होता है जो कैंसर पैदा करने वाली कोशिकाओं के विकास को रोकता है।

दिल की रक्षा में : ग्रीन टी एल.डी.एल. कोलैस्ट्राल की आक्सीडेशन को रोकती है। इस प्रकार धमनियों में प्लाक में कम होने से हृदय रोगों का खतरा कम होता है। यह सब एपीगैलोकैटेचिन गैलेट के कारण होता है।
त्वचा की रक्षा में : गर्म पानी में मिलाए गए ग्रीन टी के सत्व त्वचा पर बाहरी तौर पर लगाने से रेडिएशन के प्रभाव कम होते हैं। रेडिएशन से प्रभावी रक्षा के लिए उसे प्रतिदिन तीन बार लगाना चाहिए।

 मोटापा : ग्रीन टी की सहायता से हम शरीर में कैलोरीज के बर्न होने की प्रयिा को तेज कर सकते हैं। शरीर में पोलीफिनोल्स की जितनी अधिक मात्रा होगी उतने फैट बनग इफैक्ट्स होंगे। ग्रीन टी पोलीफिनोल्स का एक भरपूर स्रोत है इसीलिए इसे वजन कम करने वाले विकल्पों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। यह मोटापे की सबसे बढिया औषधि है। इसलिए इसे डेली डाइट में शामिल करके न सिर्फ फैट कम होती है बल्कि साथ ही यह आपके शरीर को साफ करके विभिन्न रोगों से आपकी रक्षा करती है।

टाइप 1 डाइबिटीज़ में ग्रीन टी के लाभ


टाइप 1 डाइबिटीज़ के रोगियों के लिए ग्रीन टी बहुत फायदेमंद होती है क्‍योंकि ग्रीन टी में एंटीआक्सिडेंट्स भरपूर मात्रा में पाये जाते हैं।
ब्‍लड शुगर को नियंत्रित करना

ग्रीन टी शरीर में ग्‍लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करती है,और इन्‍सुलिन दवा के हानिकारक प्रभावो को कम करने में भी मदद करती है । यूनिवर्सिटी ऑफ मेरिलैंड मेडिकल सेंटर के अनुसार ग्रीन टी शरीर में ना सिर्फ टाइप 1 डाइबिटीज़ को कम करता है बल्कि इसके बुरे प्रभाव को भी कम करता है।

हाइपरटेंशन को कम करना

2004 में चीन में किए गए एक शोध के अनुसार एक दिन में एक कप ग्रीन टी पीने से 50 प्रतिशत तक हाई ब्‍लड प्रेशर में कमी आती हैं,ग्रीन टी खून की धमनियों को आराम पहुंचाता है,जिससे हाइ ब्‍लड प्रेशर की समस्‍या में आराम मिलता हैं।

कालेस्‍ट्राल को कम करना
जो लोग रोज ग्रीन टी का सेवन करते है उनमें कालेस्‍ट्राल की मात्रा कम होती है उन लोगों के मुकाबले जो ग्रीन टी नहीं लेते इसलिए क्‍योंकि उनका मानना है कि उसमें मौजूद पॉलिफेनल से कालेस्‍ट्राल बढ़ता है।.

ग्रीन टी लेने के तरिके
रोज कम से कम आधा कप ग्रीन टी पीने से टाइप 1 डाइबिटीज़ की बीमारी से आराम मिलता हैं,एक साल तक नियमित इसका सेवन करने से ज्‍यादा से ज्‍यादा शारीरिक लाभ मिलेगा, ग्रीन टी ना पीने वालों को हाइपरटेंशन के खतरों ज्‍यादा की आशंका रहती है, रोज ग्रीन टी पीने से डाइबिटीज़ एवं हाइपरटेंशन में आराम मिलता है।

ग्रीन टी में होते हैं एक्‍टिव एजेन्‍ट
ग्रीन टी में मौजूद एक्‍टिव एजेन्‍ट जैसे केटेचीन,इजीसीजी,इन्‍सुलिन की मात्रा को बढ़ाने में मदद करती है,साथ ही यह एन्‍टी-ओक्‍सेट के रूप में भी कार्य करता है।

चेतावनी
ग्रीन टी में कैफेन की मात्रा कॉफी के मुकाबले ज्‍यादा होती है,ज्‍यादा ग्रीन टी पीने से यह इससे मिलने वाले लाभ को कम करता है,जैसे- हाइपरटेशन इत्‍यादि, कई बार डाइबिटीज़ के प्रभावों को बढ़ाता है। कोशिश करें कि टी की सही मात्रा लें ताकि आपको इसका लाभ मिल सके और आप ओवरियन कैंसर, हेपेटाइटिस एवं अन्‍य शारीरिक समस्‍याओं के खतरों से बच सके।


ग्रीन टी स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बहुत लाभदायक है। ग्रीन टी पीने से न केवल सामान्‍य बीमारियां दूर रहती हैं बल्कि कैंसर और अल्‍जाइमर के मरीजों के लिए यह फायदेमंद है।



ग्रीन टी के गुण

प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत
ग्रीन टी में विटामिन सी, पालीफिनोल्स के अलावा अन्य एंटीआक्सीडेंट मौजूद होते हैं जो कि शरीर के फ्री रेडीकल्स को नष्ट कर इम्‍यून सिस्‍टम को मजबूत बनाते हैं। दिन में तीन से चार कप ग्रीन टी शरीर में लगभग 300-400 मिग्रा पालीफिनोल पहुंचाती है, इससे शरीर में बीमारियां होने का खतरा कम होता है और शरीर रोग-मुक्‍त होता है।

कैंसर से रखे दूर
ग्रीन टी कैंसर के सेल को बढ़ने से रोकती है। ग्रीन टी मुंह के कैंसर के लिए बहुत ही फायदेमंद है। इसके नियमित प्रयोग से पाचन नली और मूत्राशय के कैंसर की आशंका न के बराबर रहती है। इसलिए कैंसर के मरीजों के लिए ग्रीन टी रामबाण है।

दिल के लिए
ग्रीन टी पीने से मेटाबॉलिज्‍म का स्‍तर बढ़ता है। जिसके कारण शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा संतुलित रहती है। कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा संतुलित रहने से रक्त चाप सामान्य रहता है। ग्रीन टी खून को पतला बनाए रखती है जिससे खून का थक्का नहीं बन पाता। ग्रीन टी पीने से हार्ट अटैक आशंका बहुत कम रहती है।

वजन घटाए
मोटापा कम करने में ग्रीन टी बहुत मदद करती है। खाने के बाद एक कप ग्रीन टी पीने से पाचन की गति बढ़ जाती है। ग्रीन टी में मौजूद कैफीन से कैलोरी खर्च करने की गति भी बढ़ जाती है। इसके कारण वजन कम होता है।

मुंह के लिए
ग्रीन टी मुंह के लिए बहुत फायदेमंद है। ग्रीन टी में ऑक्‍सीकरण रोधी पॉलीफिनॉल पाया जाता है जो मुंह में उन तत्‍वों को खत्‍म कर देता है जो सांस संबंधी परेशानियों के लिए जिम्‍मेदार होते हैं।

ग्रीन टी पर हर रोज नए-नए शोध हो रहे हैं। ग्रीन टी कई रोगों के इलाज में रामबाण साबित हुई है। ग्रीन टी अल्‍जाइमर, पार्किंसन, मल्‍टीपल स्‍कलेरोज, कैंसर, मोटापा और हृदय संबंधी रोगों के लिए फायदेमंद है।

Friday, April 3, 2015

इस्लाम मे औरत के अधिकार


इस्लाम और मुसलमानों के बारे में लोगों के मन में जो ग़लतफहमियॉ पार्इ जाती हैं उनमें से कुछ गलतफहमियॉ महिलाओं के बारे में हैं। इस्लाम से पहले आमतौर से हर समाज और हर सोसाइटी में औरत को कमज़ोर समझा जाता था। उसका अपमान किया जाता और तरह-तरह के ज़ुल्मों का उसे निशाना बनाया जाता था। • भारतीय समाज में पति के मर जाने पर पति की लाश के साथ पत्नी को भी सती कर जीवित जला दिया जाता था। • चीन में औरत के पैर में लोहे के तंग जूते पहनाए जाते थें। • अरब में लड़कियों को ज़िंदा गाड़ दिया जाता था। इतिहास गवाह हैं कि इन अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाने वाले सुधारक निकटवर्ती युग में पैदा हुए हैं, लेकिन इन सभी सुधारकों से सैकड़ों वर्ष पहले अरब देश में प्यारे नबी सल्ल0 औरतों के हितैषी के रूप में नजर आते हैं और औरतों पर ढाये जाने वाले अत्याचारों का खात्मा कर देते हैं। औरत के अधिकारों के प्रति अनभिज्ञ, अरब समाज मे प्यारे नबी सल्ल0 ने औरत को मर्द के बराबर दर्जा दिया। औरत का जायदाद और सम्पत्ति मे कोर्इ हक न था, आप स0 ने विरासत मे उसका हक नियत किया। औरत के हक और अधिकार बताने के लिए कुरआन मे निर्देश उतारे गये। मॉ-बाप और अन्य रिश्तेदारों की जायदाद में औरतों को भी वारिस घोषित किया गया। आज सभ्यता का राग अलापने वाले कर्इ देशों में औरत को न जायदाद का हक हैं न वोट देने का। इंग्लिस्तान में औरत को वोट का अधिकार 1928 र्इ0 पहली बार दिया गया। भारतीय समाज मे औरत को जायदाद का हक पिछले दिनों में हासिल हुआ। लेकिन हम देखते हैं कि आज से चौदह सौं वर्ष पूर्व ही ये सारे हक और अधिकार नबी स0 ने औरतों को प्रदान किये। कितने बड़े उपकार कर्ता हैं आप! आप स0 की शिक्षाओं में औरतों के हक पर काफी जोर दिया गया हैं। आप स0 ने ताकीद की लोग इस कर्तव्य से गाफिल न हो और न्यायसंगत रूप से औरत को मारा-पीटा न जाय। औरत के साथ कैसा बर्ताव किया जाय, इस सम्बन्ध मे नबी स0 की बातों का अवलोकन कीजिए: (1) अपनी पत्नी को मारने वाला अच्छे आचरण का नही हैं। (2) तुममें से सर्वश्रेष्ट व्यक्ति वह हैं जो अपनी पत्नी से अच्छी सूलूक करे। (3) औरतों के साथ अच्छे तरीके से पेश आपे का खुदा हुक्म देता हैं, क्योकि वे तुम्हारी मॉ, बहिन और बेटियॉ हैं। (4) मां के कदमों के नीचे जन्नत हैं। (5) कोर्इ मुसलमान अपनी पत्नी से नफरत न करें। अगर उसकी कोर्इ एक आदत बुरी हैं तो उसकी दूसरी अच्छी आदत को देख कर मर्द को खुश होना चाहिए। (6) अपनी पत्नी के साथ दासी जैसा व्यवहार न करो। उसको मारो भी मत। (7) जब तुम खाओं तो अपनी पत्नी को भी खिलाओं । जब तुम पहनो तो अपनी पत्नी को भी पहनाओं (8) पत्नी को ताने मत दों। चेहरे पर न मारो। उसका दिल न दुखाओं। उसकी छोड़कर न चले जाओं। (9) पत्नी अपने पति के स्थान पर समस्त अधिकारों की मालिक हैं। (10) अपनी पत्नियों के साथ जो अच्छी तरह बर्ताव करेंगे, वही तुम में सबसे बेहतर हैं। ठतने अधिकार प्रदान करके औरत को बिल्कुल आजाद भी नही छोड़ा, बल्कि उसे कुछ बातों का पाबन्द भी किया: 1-औरत इस तरह रहे कि जब उसका पति उसे देखे तो खुश हो जाय। जब कोर्इ हुक्म दे तो उसे पूरा करें। पति अगर दूर हो तो उसकी सम्पत्ति और अपने सतीत्व की सुरक्षा करें। ऐसी ही स्त्री आदर्श पत्नी समझी जायेगी। 2-सुशीला पत्नी का मिल जाना अमूल्य पूंजी के बराबर हैं। 3-जो पांचो समय की रोजाना नमाज पढ़े, रमजान के रोजे रखे और अपने पति का कहा माने तथा अपने सतीत्व की सुरक्षा करें, ऐसी औरत जिस रास्ते से चाहे जन्नत में प्रवेश करें। 4-दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा कीमती चीज पाक दामन बीबी हैं। इस तरह प्यारे नबी स0 ने औरतों को अधिकार भी दिये और उन्हे उनके कर्तव्यो से भी बाखबर किया। किसी को आपत्ति हो सकती हैं कि औरतों को इतने सारे अधिकार प्रदान करने वाले इस्लाम में बहुपत्नीवाद की अनुमति क्यों हैं? क्या यह औरतों पर खुला जुल्म नहीं हैं। इस सिलसिले में हमे इतिहास, पुरूष के स्वभाव और जिन्दगी के व्यावहारिक मसलों को सामने रखना होगा। हिन्दुस्तान के राजा दशरथ के कर्इ पतिनयां थी। इसी तरह कृष्णाजी को भी हम रूक्मिणी, सत्यबा और राधा के अलावा असंख्य गोपियों के बीच देखते हैं। बल्ली औरतों के साथ मरगन जैसे देवता को हम ऐश करते हुए पाते हैं। यह तो थी प्राचीन काल और पुराणों की बात, अब ऐतिहासिक घटनाओं को लीजिए। बड़े-बड़े राजाओं के यहॉ एक से अधिक पत्नियॉ होती थी। तमिलनाडू के कटटा बम्मन के घर कर्इ पत्नियां थी। आज भी कुछ राजनैतिक नेता कर्इ पत्नियां रखते हैं। इस्लाम से पहले अरब मे पत्नियों की संख्या पर कोर्इ हदबन्दी नही थी। प्यारे नबी ने मर्द के स्वभाव और अमली जरूरतों का ध्यान रख कर इस असीम संख्या को चार तक सीमित रखा। इस्लाम से पहले अरब दुनिया में शादी विवाह का कोर्इ विशेष नियम और सिद्धान्त न था। गिरोहो और कबीलों के बीच पत्नियॉ और दासियां रखने जब चाहा तलाक दे दी, इन हालात के सुधार के लिए खुदा के निर्देश आये, पत्नियों की संख्या को सीमित कर दिया गया और तलाक के सम्बन्ध में उचित नियमों और शिष्टाचार की पाबन्दी का हुक्म दियागया कुरआन में फरमाया गया। ‘‘ तुम्हे अगर आशंका हो कि यतीम बच्चो की परवरिश बगैर शादी किये न हो सकेगी तो अपनी पसन्द की दो, तीन या चार औरतों से तुम विवाह कर सकते हो (यह आशंका हो कि उनके साथ भी तुम न्याय न कर पाओगे तो) और औरत या दासी ही पर बस करो, अन्याय से बचने के लिए यह आसान तरीका हैं। (निसा 6) क्ुरआन की इस हिदायत मे जो हिकमते और भलार्इयां हैं उन पर भी विचार कीजिए। न्याय, इंसाफ तथा सच्चार्इ के साथ पत्नी से पेश आओ। बहुस्त्रीवाद की अनुमति भी हैं और इसी के साथ-साथ नाइंसाफी से बचने की ताकीद भी। न्याय और इन्साफ सम्भव न हो तो एक ही शादी पर जोर दिया गया हैं। मर्द को किसी भी समय अपनी काम तृष्णा की जरूरत पेश आ सकती हैं। इसलिए कि उसे कुदरत ने हर हाल मे हमेशा सहवास के योग्य बनाया हैं जबकि औरतों का मामला इससे भिन्न हैं। माहवारी के दिनो मे, गर्भावस्था में (नौ-दस माह) प्रसव के बाद के कुछ माह औरत इस योग्य नही होती कि उसके साथ उसका पति सम्भोग कर सके। सारे ही मर्दो से यह आशा रखना सही न होगा कि वे बहुत ही संयम और नियन्त्रण से काम लेंगे और जब तक उन की पत्नियां इस योग्य नही हो जाती कि वे उनके पास जायें, वे काम इच्छा को नियंत्रित रखेंगे। मर्द जायज तरीके से अपनी जरूरत पूरी कर सके, जरूरी है कि इसके लिए राहे खोली जायें और ऐसी तंगी न रखी जाय कि वह हराम रास्तों पर चलने पर विवश हों। पत्नी तो उसकी एक ही हो, आशना औरतों की कोर्इ कैद न रहे। इससे समाज मे जो गन्दगी फैलेगी और जिस तरह आचरण और चरित्र खराब होंगे इसका अनुमान लगाना आपके लिए कुछ मुश्किल नही हैं। व्यभिचार और बदकारी को हराम ठहराकर बहुस्त्रीवाद की कानूनी इजाजत देने वाला बुद्धिसंगत दीन इस्लाम हैं। इस्लाम और मुसलमानों के सम्बन्ध में जो ग़लतफहमियॉ पार्इ जाती हैं उनमें से कुछ गलतफहमियॉ औरतों के बारे में हैं। इस्लाम से पहले आमतौर से हर समाज और हर सोसाइटी में औरत को हीन समझा था। उसका अपमान किया जाता और तरह-तरह के अत्याचारों का उसे निशाना बनाया जाता था। • भारतीय समाज में पति के मर जाने पर पति की लाश के साथ पत्नी को भी जिन्दा जल जाना पड़ता था। • चीन में औरत के पैर में लोहे के तंग जूते पहनाए जाते थें। • अरब में लड़कियों को जीवित गाड़ दिया जाता था। इतिहास गवाह हैं कि इन अत्याचारों के विरूद्ध आवाज उठाने वाले सुधारक निकटवर्ती युग में पैदा हुए हैं, लेकिन इन सभी सुधारकों से शताब्दियों पहले अरब देश में प्यारे नबी सल्ल0 औरतों के हितैषी के रूप में नजर आते हैं और औरतों पर ढाये जाने वाले अत्याचारों का खात्मा कर देते हैं। औरत के अधिकारों से अनभिज्ञ, अरब समाज मे प्यारे नबी सल्ल0 ने औरत को मर्द के बराबर दर्जा दिया। औरत का जायदाद और सम्पत्ति मे कोर्इ हक न था, आप स0 ने विरासत मे उसका हक नियत किया। औरत के हक और अधिकार बताने के लिए कुरआन मे निर्देश उतारे गये। मॉ-बाप और अन्य रिश्तेदारों की जायदाद में औरतों को भी वारिस घोषित किया गया। आज सभ्यता का राग अलापने वाले कर्इ देशों में औरत को न जायदाद का हक हैं न वोट देने का। इंग्लिस्तान में औरत को वोट का अधिकार 1928 र्इ0 पहली बार दिया गया। भारतीय समाज मे औरत को जायदाद का हक पिछले दिनों में हासिल हुआ। लेकिन हम देखते हैं कि आज से चौदह सौं वर्ष पूर्व ही ये सारे हक और अधिकार नबी स0 ने औरतों को प्रदान किये। कितने बड़े उपकार कर्ता हैं आप! आप स0 की शिक्षाओं में औरतों के हक पर काफी जोर दिया गया हैं। आप स0 ने ताकीद की लोग इस कर्तव्य से गाफिल न हो और न्यायसंगत रूप से औरत को मारा-पीटा न जाय। औरत के साथ कैसा बर्ताव किया जाय, इस सम्बन्ध मे नबी स0 की बातों का अवलोकन कीजिए: (1) अपनी पत्नी को मारने वाला अच्छे आचरण का नही हैं। (2) तुममें से सर्वश्रेष्ट व्यक्ति वह हैं जो अपनी पत्नी से अच्छी सूलूक करे। (3) औरतों के साथ अच्छे तरीके से पेश आपे का खुदा हुक्म देता हैं, क्योकि वे तुम्हारी मॉ, बहिन और बेटियॉ हैं। (4) मां के कदमों के नीचे जन्नत हैं। (5) कोर्इ मुसलमान अपनी पत्नी से नफरत न करें। अगर उसकी कोर्इ एक आदत बुरी हैं तो उसकी दूसरी अच्छी आदत को देख कर मर्द को खुश होना चाहिए। (6) अपनी पत्नी के साथ दासी जैसा व्यवहार न करो। उसको मारो भी मत। (7) जब तुम खाओं तो अपनी पत्नी को भी खिलाओं । जब तुम पहनो तो अपनी पत्नी को भी पहनाओं (8) पत्नी को ताने मत दों। चेहरे पर न मारो। उसका दिल न दुखाओं। उसकी छोड़कर न चले जाओं। (9) पत्नी अपने पति के स्थान पर समस्त अधिकारों की मालिक हैं। (10) अपनी पत्नियों के साथ जो अच्छी तरह बर्ताव करेंगे, वही तुम में सबसे बेहतर हैं। ठतने अधिकार प्रदान करके औरत को बिल्कुल आजाद भी नही छोड़ा, बल्कि उसे कुछ बातों का पाबन्द भी किया: 1-औरत इस तरह रहे कि जब उसका पति उसे देखे तो खुश हो जाय। जब कोर्इ हुक्म दे तो उसे पूरा करें। पति अगर दूर हो तो उसकी सम्पत्ति और अपने सतीत्व की सुरक्षा करें। ऐसी ही स्त्री आदर्श पत्नी समझी जायेगी। 2-सुशीला पत्नी का मिल जाना अमूल्य पूंजी के बराबर हैं। 3-जो पांचो समय की रोजाना नमाज पढ़े, रमजान के रोजे रखे और अपने पति का कहा माने तथा अपने सतीत्व की सुरक्षा करें, ऐसी औरत जिस रास्ते से चाहे जन्नत में प्रवेश करें। 4-दुनिया की सारी दौलत से ज्यादा कीमती चीज पाक दामन बीबी हैं। इस तरह प्यारे नबी स0 ने औरतों को अधिकार भी दिये और उन्हे उनके कर्तव्यो से भी बाखबर किया। किसी को आपत्ति हो सकती हैं कि औरतों को इतने सारे अधिकार प्रदान करने वाले इस्लाम में बहुपत्नीवाद की अनुमति क्यों हैं? क्या यह औरतों पर खुला जुल्म नहीं हैं। इस सिलसिले में हमे इतिहास, पुरूष के स्वभाव और जिन्दगी के व्यावहारिक मसलों को सामने रखना होगा। हिन्दुस्तान के राजा दशरथ के कर्इ पतिनयां थी। इसी तरह कृष्णाजी को भी हम रूक्मिणी, सत्यबा और राधा के अलावा असंख्य गोपियों के बीच देखते हैं। बल्ली औरतों के साथ मरगन जैसे देवता को हम ऐश करते हुए पाते हैं। यह तो थी प्राचीन काल और पुराणों की बात, अब ऐतिहासिक घटनाओं को लीजिए। बड़े-बड़े राजाओं के यहॉ एक से अधिक पत्नियॉ होती थी। तमिलनाडू के कटटा बम्मन के घर कर्इ पत्नियां थी। आज भी कुछ राजनैतिक नेता कर्इ पत्नियां रखते हैं। इस्लाम से पहले अरब मे पत्नियों की संख्या पर कोर्इ हदबन्दी नही थी। प्यारे नबी ने मर्द के स्वभाव और अमली जरूरतों का ध्यान रख कर इस असीम संख्या को चार तक सीमित रखा। इस्लाम से पहले अरब दुनिया में शादी विवाह का कोर्इ विशेष नियम और सिद्धान्त न था। गिरोहो और कबीलों के बीच पत्नियॉ और दासियां रखने जब चाहा तलाक दे दी, इन हालात के सुधार के लिए खुदा के निर्देश आये, पत्नियों की संख्या को सीमित कर दिया गया और तलाक के सम्बन्ध में उचित नियमों और शिष्टाचार की पाबन्दी का हुक्म दियागया कुरआन में फरमाया गया। ‘‘ तुम्हे अगर आशंका हो कि यतीम बच्चो की परवरिश बगैर शादी किये न हो सकेगी तो अपनी पसन्द की दो, तीन या चार औरतों से तुम विवाह कर सकते हो (यह आशंका हो कि उनके साथ भी तुम न्याय न कर पाओगे तो) और औरत या दासी ही पर बस करो, अन्याय से बचने के लिए यह आसान तरीका हैं। (निसा 6) क्ुरआन की इस हिदायत मे जो हिकमते और भलार्इयां हैं उन पर भी विचार कीजिए। न्याय, इंसाफ तथा सच्चार्इ के साथ पत्नी से पेश आओ। बहुस्त्रीवाद की अनुमति भी हैं और इसी के साथ-साथ नाइंसाफी से बचने की ताकीद भी। न्याय और इन्साफ सम्भव न हो तो एक ही शादी पर जोर दिया गया हैं। मर्द को किसी भी समय अपनी काम तृष्णा की जरूरत पेश आ सकती हैं। इसलिए कि उसे कुदरत ने हर हाल मे हमेशा सहवास के योग्य बनाया हैं जबकि औरतों का मामला इससे भिन्न हैं। माहवारी के दिनो मे, गर्भावस्था में (नौ-दस माह) प्रसव के बाद के कुछ माह औरत इस योग्य नही होती कि उसके साथ उसका पति सम्भोग कर सके। सारे ही मर्दो से यह आशा रखना सही न होगा कि वे बहुत ही संयम और नियन्त्रण से काम लेंगे और जब तक उन की पत्नियां इस योग्य नही हो जाती कि वे उनके पास जायें, वे काम इच्छा को नियंत्रित रखेंगे। मर्द जायज तरीके से अपनी जरूरत पूरी कर सके, जरूरी है कि इसके लिए राहे खोली जायें और ऐसी तंगी न रखी जाय कि वह हराम रास्तों पर चलने पर विवश हों। पत्नी तो उसकी एक ही हो, आशना औरतों की कोर्इ कैद न रहे। इससे समाज मे जो गन्दगी फैलेगी और जिस तरह आचरण और चरित्र खराब होंगे इसका अनुमान लगाना आपके लिए कुछ मुश्किल नही हैं। व्यभिचार और बदकारी को हराम ठहराकर बहुस्त्रीवाद की कानूनी इजाजत देने वाला बुद्धिसंगत दीन इस्लाम हैं। एक से अधिक शादियों क मर्यादित रूप में अनुमति देकर वास्तव में इस्लाम ने मर्द और औरत की शारीरिक संरचना, उनकी मानसिक स्थितियों और व्यावहारिक आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा हैं और इस तरह हमारी दृष्टि में इस्लाम बिल्कुल एक वैज्ञानिक धर्म साबित होता हैं। यह एक हकीकत है, जिसपर मेरा दृढ़ और अटल विश्वास हैं। एक से अधिक शादियों क मर्यादित रूप में अनुमति देकर वास्तव में इस्लाम ने मर्द और औरत की शारीरिक संरचना, उनकी मानसिक स्थितियों और व्यावहारिक आवश्यकताओं का पूरा ध्यान रखा हैं और इस तरह हमारी दृष्टि में इस्लाम बिल्कुल एक वैज्ञानिक धर्म साबित होता हैं। यह एक हकीकत है, जिसपर मेरा दृढ़ और अटल विश्वास हैं।

मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद एके-47 केस

मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद के एके-47 केस में कोई समानता नहीं है लेकिन हाल ही के लिए गए निर्णयों में जहां मुजफ्फरनगर भीषण दंगो के केस वापस ल...