Thursday, March 30, 2017

चुनाव के बाद हालात और हल


यू.पी. चुनाव में मिले भाजपा को प्रचंड बहुमत के कारण आज मुसलमान सकते की हालत में हैं। क्योंकि मुसलमानों ने वोट भाजपा को हराने के लिए दिया था, मगर हुआ उल्टा भाजपा को हराना तो दूर उल्टे यू.पी. विधान सभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व भी कम हो गया। उलेमा और बुद्धिजीवियों की सारी अपीलें बेकार हो गई और मुसलमानों का वोट तकरीबन हर मुस्लिम बाहुल सीट पर और अन्य सीटों पर दो जगह या की कहीं कहीं तीन जगह बंट गया।
मुसलमानों की संख्या भारत में 20 प्रतिशत के आस पास है जिसमें पश्चिमी यू0पी0 में तकरीबन 35 प्रतिशत के करीब है। मगर वहां भी मुसलमानों को कोई ज्यादा फायदा नही मिला।
सपा व बसपा दो पार्टियों ने यूपी मंे बारी-बारी सरकार बनाई लेकिन आज की तारीख में सपा के पास मुसलमानों और 5- 7 प्रतिशत यादवों के अलावा कोई दूसरा वोट बैंक नही है। इसी तरह बसपा के पास जाटवों के अलावा कोई वोट बैंक नही बचा। कांग्रेस तो है ही डूबता जाहज़।
मायावती ने पिछली बार अपनी हार का कारण मुसलमानों की गददारी बताया था इस बार वो ईवीएम मशीन को दोष दे रहीं हैं।
सपा व कांग्रेस ने मुसलमानों को दोष नही दिया लेकिन सुगबुगाहट उसमे भी है। लेकिन अगर हम देखें तो मालूम होगा कि सपा ने अपने 5 साल के कार्यकाल में मुसलमानों को कितना दिया है तो मालूम होगा कि सबसे ज्यादा दंगे फसाद और कब्रिस्तान की दीवारें, थोड़े उर्दू टीचर और थोड़ी बहुत पेंशन। प्रदेश में पिछली कुछ सरकारों के मुकाबले इस बार कुछ ज्यादा विकास भी हुआ मगर मुसलमानों की मूल समस्याएं जस की तस ही हैं। मुसलमानों से किया 18 प्रतिशत आरक्षण का वादा तो पूरा हो ही नही सका और न ही जेल में बंद बेकसूर मुसलमान ही छूट सके। फिर भी मुसलमानों ने सपा को अपना भरपूर वोट दिया।
आज भी मुसलमानों के इलाकों में स्कूल कालिज और बैंक से ज्यादा पुलिस चैकी मिलती हंै। लेकिन पक्षपात के नाम पर प्रदेश में हिन्दु वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ और भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। इस कारण मुसलमानों को भी अपना व्यवहार बदलना होगा।
आज जब हम देखते हैं कि आजाद को 70 वर्ष के करीब हो चुके हैं और मुसलमान आज भी उसी हालत में है जो आजादी के समय में था। मुसलमानों ने समय समय पर कांग्रेस को अपना पूरा समर्थन दिया मगर कांग्रेस ने मुसलमानों को न कुछ देना था और न ही कुछ दिया। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट इस बात की गवाह है। कांग्रेस ने बड़े सुनियोजित तरीके से मुसलमानों के खिलाफ काम किया और साम्प्रदायिक तत्वों से डराकर मुसलमानों का वोट भी लेती रही। यही हालत तकरीबन सभी कथित सेक्यूलर दलों की रही। इन दलों ने मुसलमानों को
संघ से डराया और खूब वोट लिया और देश में अधिकतर समय सरकार बनाई।
समय समय पर मुसलमानों को मन्त्रालय भी दिए गये लेकिन सभी मुसलमान मंत्री कठपुतली ही थे और न तो सरकार ने, न मुस्लिम मंत्रियांे ने मुसलमानों के लिए कुछ किया। इस सबसे पता चलता है कि मुसलमानों को किसी राजनैतिक क्रान्ति की जरूरत नही है क्योंकि आज तक राजनीति से कुछ हासिल ही न हो सका। अब मुसलमानों को शैक्षिक आन्दोलन या सामाजिक आन्दोलन की जरूरत है जिससे मुसलमान अपना जीवन स्तर सुधार सकें। मुसलमानों को इतिहास से सबक लेते हुए आगे बढना चाहिए आजादी के आन्दोलन के समय भी अंगे्रजी भाषा और व्यवस्था का बायकाट के कारण मुसलमानों को एक बड़े नुकसान से गुजरना पड़़ा जिसका खामियाजा हम आज तक भुगत रहे हंै। अब हमारी यह कोशिश होनी चाहिए कि हम इतिहास न दोहराए और मोदी सरकार एवं संघ आदि का विरोध न करें। मुसलमानों को राजनीति के अलावा देश में दूसरे मौके ढूढने चाहिए। इसके अलावा मुसलमानों को इस्लाम की सही जानकारी दूसरे धर्म के लोगों को देनी चाहिए ताकि साम्प्रदायिक तत्वों द्वारा फैलाई गई इस्लाम के प्रति भ्रांतियों को दूर किया जा सके। इन भ्रांतियों के कारण ही हिन्दुओं में मुसलमानों के प्रति नफरत बढ़ रही है और वे मुसलमानों से दूर हो रहे हैं। इस लिए यह आज की सबसे बड़ी जरूरत भी है कि मुसलमान इस्लाम को खुद भी समझे और दूसरे देशवासियों को भी समझाए। इससे आपस में प्यार मुहब्बत भी बढेगा सारी समस्याएं जज्बात में आकर ही हल करने की न साचे, प्यार मोहब्बत बड़़ी चीज है उसी से हल करने का प्रयास करें।
सोर्सपश्चिमी उजाला मासिक

Saturday, March 11, 2017

नास्तिक और आस्तिक :साजिद हसन


संसार में देखने में दो तरह के लोग मिलते हैं, आस्तिक और नास्तिक। नास्तिक का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट होता है। वह कहता है नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है। वह उसी दृष्टिकोण से संसार में कार्य भी करता है। हांलाकि समय-समय पर ईश्वर  की सत्ता का उसे आभास भी होता है। परन्तु नास्तिक इन आभासों को संयोग या अपवाद का नाम देकर अपनी आस्था और दृष्टिकोण पर टिका रहता है। वह अपना एक दृष्टिकोण रखता है कि ईश्वर नहीं है।
जबकि  आस्तिक यह कहता है कि मालिक है। यही नहीं वह दिल से यह मानता है कि मालिक एक है। परन्तु जैसे ही वह ज़िन्दगी के मुश्किल हालातों से दो चार होता है। आस्था बदलने लगती है। अपनी कठिनाईयों और कष्टों को दूर करने के लिए उसे जहां जो हल नज़र आता है, वह वहां दौड़ पड़ता है। यह बिखरा हुआ मनुष्य बहुत से मालिकों को मानने लगता है। उसकी जो समस्या जहां से दूर हो, वही उसका देवता, उसका मालिक बन जाता है। ऐसे मनुष्य एक से हटकर बहुत से मालिकों की तरफ चला जाता है और यह क्रम बढ़ता हुआ, उसके करीब के लोगों को भी प्रभाव में ले लेता है। कुछ सामाजिक प्रभाव ऐसे होते हैं जो धर्म को, सत्य को भी तोड़-मरोड़ डालते हैं।
धर्म का स्वरूप इस तरह बिगड़ जाता है। क्योंकि धर्म के नाम पर धंधा करने वाले लोग, समाज को सत्य बताकर कोई झंझट और नुकसान नहीं उठाना चाहते, अतएव वो उन सामाजिक प्रभावों और घटनाओं को धार्मिक रूप देकर समाज का समर्थन हासिल करते रहते हैं, और इस तरह समाज बंटता चला जाता है।
यूरोप का मशहूर कला-विज्ञ टॉलस्टाय कहता है कि बाद में ये धर्मशास्त्री भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में बंट गये, एक दूसरे के मत का विरोध करने लगे और उन्हें स्वंय अनुभव होने लगा कि उनकी बुद्धि चकरा गयी है और वे अपनी कही हुई बातें नहीं समझ पा रहे हैं किन्तु जनता ने उनसे फिर उसी प्रिय सिद्धान्त की पुष्टि करने की मांग की। अतः उन्हें यह ढोंग रचना पड़ा कि वे जो कुछ कहते हैं, उसे समझते हैं, और उस पर विश्वास भी है।
                                                                                                                    स्रोत:पश्चिमी उजाला मासिक

Thursday, March 2, 2017

अपने- अपने नारे


                                           
कवि गुरु वीरेन्द्र वीर संस्कारी

                                          केवल यही दुआ है दिल से, सबका घर आबाद रहे 
                                          बटन दबाने से पहले सबको बगांल कैराना याद रहे
चुनाव के दिनो में बहुत सारे नारे सुनने को मिले आजकल सोशल मिडिया के दौरे में नारों का आदान प्रदान बहुत आसान हो गया है लोग सोषल मिडिया से ही पार्टी और प्रत्याशी  का प्रचार कर रहें है ऊपर लिखा नारा हमरे एक निकटतम दोस्त ने भेजा जो की धर्म से हिन्दु है लेकिन हमारी दोस्ती के बीच धर्म आडे नही आता इस नारे से जहा एक ओर दुआ दी गई है दुसरी और भाजपा द्वारा उठाए गए पलायन के ;कैरानाद्ध मुद्दे को भी दर्शाया गया। साफ है कि यह नारा भाजपा के पक्ष में है इसमे बहुसंख्यको को अल्पसख्ंयको से डराया गया है और उन्हें एहसास दिलाया गया है कि दे मे हिन्दु खतरे में है और अगर हमे वोट न दिया तो सारे दे में ही हिन्दुओ का पलायन होगा इसी तरह का माहौल पिछले दिनों बनया गया था जब भी कोई चुनाव आता है तो इस तरह के नारे सिर्फ एक पक्ष की और से ही नही दिये जाते है अपुति ऐसे नारे तो सभी पार्टियाँ वोटरो को अपनी ओर करने के लिए देती है आज के दौर जब किसी बात या अफवाह को फैलाने मंे बहुत ज्यादा वक्त नही लगता यह सभी जगह एक साथ ही फैल जाती है इस तरह के नारे जनता में खतरनाक असुरक्षा का रूझान पैदा करते है मुसलमानो में असुरक्षा की भावना पहले से ही मौजूद है वो वोट ही अपनी सुरक्षा के नाम पर देते है मुसलमानो के यहां विकास कोई मुद्दा ही नही होता। ऐसी ही भावना अगर हिन्दुओ में पैदा हो जाए तो देष का क्या भविष्य होगा इसे समझदार लोग समझ रहें है। इन जैसे नारों के कारण लोगो मंे जहाँ अविश्वास  बढ रहा है वही दिलो में बेर की भावना आ रही है लेकिन संघ परिवार या भाजपा का वोट बैंक मजबूत हो रहा है इस कारण शायद ही ऐसे नारों में कमी आए।
भारत एवं भारतीय सस्कृति ने हमेशा से अच्छी बातो को कबूल किया। यहां के त्यौहार भी बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक है लेकिन राजनैतिक पार्टीयाँ साम, दाम, दण्ड भेद की नीती अपनाकर हर तरह के पैतरे इस्तेमाल करती है आज दे में विकास कोई मुद्दा नही है कोई पार्टी कह रही है संघ आ रहा है हमें वोट डालो हम आपको बचाएगें, कोई राजनैतिक दल दूसरे धर्माे के लोगो को मुसलमानो की बढती आबादी के बारे में चेता रहा है कोई जाति की राजनीति कर रहा है तो कोई क्षेत्र वाद को बढावा देकर देष की अंखडता को खतरे में डाल रहा है सबके अपने-अपने नारे है अब समय आ गया है राजनैतिक दल दे के भविष्य के बारे मंे भी सोचें। क्योकि अब अगर अब जनता खामोश है तो आने वाली पीढीया उनसे ज़रूर जवाब मांगेगी।

मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद एके-47 केस

मुजफ्फरनगर दंगे और देवबंद के एके-47 केस में कोई समानता नहीं है लेकिन हाल ही के लिए गए निर्णयों में जहां मुजफ्फरनगर भीषण दंगो के केस वापस ल...