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नास्तिक और आस्तिक :साजिद हसन


संसार में देखने में दो तरह के लोग मिलते हैं, आस्तिक और नास्तिक। नास्तिक का दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट होता है। वह कहता है नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है। वह उसी दृष्टिकोण से संसार में कार्य भी करता है। हांलाकि समय-समय पर ईश्वर  की सत्ता का उसे आभास भी होता है। परन्तु नास्तिक इन आभासों को संयोग या अपवाद का नाम देकर अपनी आस्था और दृष्टिकोण पर टिका रहता है। वह अपना एक दृष्टिकोण रखता है कि ईश्वर नहीं है।
जबकि  आस्तिक यह कहता है कि मालिक है। यही नहीं वह दिल से यह मानता है कि मालिक एक है। परन्तु जैसे ही वह ज़िन्दगी के मुश्किल हालातों से दो चार होता है। आस्था बदलने लगती है। अपनी कठिनाईयों और कष्टों को दूर करने के लिए उसे जहां जो हल नज़र आता है, वह वहां दौड़ पड़ता है। यह बिखरा हुआ मनुष्य बहुत से मालिकों को मानने लगता है। उसकी जो समस्या जहां से दूर हो, वही उसका देवता, उसका मालिक बन जाता है। ऐसे मनुष्य एक से हटकर बहुत से मालिकों की तरफ चला जाता है और यह क्रम बढ़ता हुआ, उसके करीब के लोगों को भी प्रभाव में ले लेता है। कुछ सामाजिक प्रभाव ऐसे होते हैं जो धर्म को, सत्य को भी तोड़-मरोड़ डालते हैं।
धर्म का स्वरूप इस तरह बिगड़ जाता है। क्योंकि धर्म के नाम पर धंधा करने वाले लोग, समाज को सत्य बताकर कोई झंझट और नुकसान नहीं उठाना चाहते, अतएव वो उन सामाजिक प्रभावों और घटनाओं को धार्मिक रूप देकर समाज का समर्थन हासिल करते रहते हैं, और इस तरह समाज बंटता चला जाता है।
यूरोप का मशहूर कला-विज्ञ टॉलस्टाय कहता है कि बाद में ये धर्मशास्त्री भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों में बंट गये, एक दूसरे के मत का विरोध करने लगे और उन्हें स्वंय अनुभव होने लगा कि उनकी बुद्धि चकरा गयी है और वे अपनी कही हुई बातें नहीं समझ पा रहे हैं किन्तु जनता ने उनसे फिर उसी प्रिय सिद्धान्त की पुष्टि करने की मांग की। अतः उन्हें यह ढोंग रचना पड़ा कि वे जो कुछ कहते हैं, उसे समझते हैं, और उस पर विश्वास भी है।
                                                                                                                    स्रोत:पश्चिमी उजाला मासिक

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